शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जाते हुए वर्ष की पदचाप--- मीनाक्षी स्वामी

आज सोच रही हूं कि जाते हुए साल में क्या हुआ तो एक किताब का लोकार्पण...

कुछ कहानियां प्रकाशित, अप्रकाशित...। खास एक उपन्यास...एक ब्लाग...ग्यारह पोस्ट...कई टिप्पणियां...एक फेसबुक...कुछ मित्र....।  बीते साल की शुरुआत महेश्वर से फिर जयपुर, वाराणसी, ग्वालियर, उज्जैन, भोपाल, बेतूल छोटी छोटी यात्राएं...और कुछ रिजर्वेशन केंसल । उपन्यास "भूभल" पाठक मंच में।कुछ अनुवाद आए अंग्रेजी, मराठी और तमिल में...। 
 


कुछ कार्यक्रमों में शिरकत। 
 कुछ कार्यशालाएं...।
बहुत सारे अधूरे काम और ख्वाहिशें....शायद इस नए साल में पूरे हों।
और हां दो पुरस्कार उपन्यास "भूभल" पर एक वाराणसी से कादम्बरी पुरस्कार...

 और दूसरे की जाते जाते साल ने दी सूचना 



 उपन्यास "भूभल" पर ही
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार...।

और एक कहानी गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय हरिद्वार  में एम. ए. के पाठ्यक्रम में...।
अच्छा ही रहा...।

देखते हैं आने वाले साल में क्या होता है.....?

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

सम्मान समारोह ---मीनाक्षी स्वामी

                 अखिल भारतीय विद्वत् परिषद, वाराणसी द्वारा वाराणसी में पिछले दिनों भव्य आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि थे पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री श्री आरिफ मोहम्मद खान। अति विशिष्ट अतिथि संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप,  संस्कृत अकादमी गुजरात के निदेशक श्री जयप्रकाश नारायण द्विवेदी, महर्षि पणिनी संस्क्रत विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, वेंकटेश वेद विश्वविद्यलय के कुलपति श्री सुदर्शन शर्मा।
                आरम्भ में अतिथियों ने दीप प्रज्जवन कर आयोजन का शुभारंभ किया।
                श्री आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि हमारी पहचान भारतीयता है। इसे कायम कर लें तो हम दुनिया में सबसे ताकतवर हो जाएंगें। संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप ने कहा कि आज विद्या का अवमूल्यन हो गया है, संस्क्रत की पुनर्स्थापना से यह उन्नत होगा।



                इस आयोजन में मेरे उपन्यास ‘भूभल’ को कादम्बरी पुरस्कार से पुरस्क्रत किया गया। पुरस्कार स्वरूप पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री श्री आरिफ मोहम्मद खान, संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप, संस्कृत अकादमी गुजरात के निदेशक श्री जयप्रकाश द्विवेदी व संस्था के अध्यक्ष श्री जयशंकर त्रिपाठी द्वारा ग्यारह हजार रुपये, वाग्देवी प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र, शाल, श्रीफल प्रदान किए गए।
                इस अवसर पर डा. कामेश्वर उपाध्याय की पुस्तक "हिंदू जीवन पद्धति" का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम का संचालन किया डा. कामेश्वर उपाध्याय ने।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

"भूभल"---मीनाक्षी स्वामी

"भूभल" उपन्यास से कथा अंश ----मीनाक्षी स्वामी


मित्रों, आप सभी को यह जानकर खुशी होगी कि मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ने इस उपन्यास को पाठक मंच के लिये चुना तो जून जुलाई में प्रदेश भर में चर्चा, प्रशंसा हुई।

वाराणसी में अखिल भारतीय विद्वत् परिषद ने इसे पुरस्कार के लिये चुना है। नवम्बर में आयोजन है।


सर्दियों के छोटे-छोटे दिन।
शाम साढ़े पांच-छह बजे तक तो अंधेरा घिर जाता। ठंड के मारे लोग घरों में दुबक जाते। सड़कें भी सुनसान। बच्चे स्कूल से आकर कुछ खाते-पीते, तरोताजा होते कि घना अंधेरा घिर जाता। खेलना तो हो ही नहीं पाता।
वह महीने का आखिरी दिन था। हमेशा की तरह स्कूल आधे दिन ही लगा। बच्चे जल्दी घर आ गए थे। बहुत दिनों बाद शाम को खेलने का कार्यक्रम बना। तय हुआ कि काका के पास जाएंगें। फिर वहीं खेल कूद कर वापस आ जाएंगें। सरला, राज, इंदु, कंचन और दिनेश सब चल दिए, काका की नर्सरी की तरफ।
‘‘अच्छा हुआ आ गए, आज मेथी के परांठे खिलाउंगा।’’ काका ने स्नेह से भिगो दिया।
‘‘मेथी के परांठे के साथ टमाटर की सब्जी......।’’ सरला चिहुंकी
‘‘हां काका, पर अभी तो हम खेलेंगें।’’ राज ने टोका
‘‘ओह ! अभी तो मैं भी तैयारी करूंगा। तुम खेलो तब तक.....।’’
काका नर्सरी के पीछे की तरफ मेथी, टमाटर तोड़ने चले गए। बच्चे छुपा छाई खेलने लगे। पहली बार सरला पर दाम आया। नर्सरी काफी बड़े मैदान में फैली थी। बच्चे दूर-दूर जाकर छुप गए। उन्हें ढूंढने में सरला को देर लगी। अगली बार राज पर दाम आया। जब उसने ढूंढा तो सब तो मिल गए पर सरला नहीं मिली।
‘‘जाने कहां दूर जाकर छुपी है...सरला....।’’
‘‘सरला.......’’ राज ने आगे बढ़ते हुए आवाज दी।
दूसरे बच्चों ने भी आवाज दी।
‘‘हमेशा ऐसे ही करती है......सरला...सरला....।’’ आवाज देते हुए बच्चे नर्सरी में घूम कर, पेड़ों, झाडि़यों के पीछे सरला को ढूंढने लगे।
‘‘खेल खतम हो गया है सरला...निकल आओ।’’ कंचन ने हथेलियों का भोंपू सा बनाकर आवाज दी। मगर कोई जवाब नहीं आया। दूर एक जगह झाडि़यां हिलती सी दिखी तो बच्चे उसी दिशा में दौड़े मगर वहां कोई नहीं था। चारों हैरान - परेशान ढूंढ रहे थे। देर होने से घर वालों की डांट का डर भी सता रहा था। अंधेरा तेजी से फैल रहा था।
‘‘कहां गई होगी सरला......काका के पास चलें कभी उनके पास हो तो !’’ कंचन बोली
‘‘हां-हां काका के पास चलते हैं, वहीं होगी वो...।’’ इंदु ने कहा।
‘‘नहीं होगी तो भी काका हमारे साथ ढूंढेंगें।’’ राज ज्यादा चिंतित था।
तभी सरला के चीखने की आवाज सुनाई दी। आवाज नर्सरी के पीछे की तरफ से आ रही थी। बच्चे आवाज की दिशा में दौड़े।
‘‘कौन है...?’’ फिर काका की कड़क आवाज आई।
तभी मोटर साईकिल स्टार्ट करने की आवाज आई जो कुछ पलों में ही बंद हो गई।
फिर काका की आवाज आई - ‘‘अरे बाबा रे...मार डाला रे...नहीं छोड़ूंगा...तुम्हें नहीं छोड़ूंगा...।’’
काका के कराहने की आवाज के साथ मोटर साईकिल स्टार्ट होकर घीरे-घीरे उसकी आवाज दूर जाती सुनी बच्चों ने। वे आवाज की दिशा की तरफ दौड़ पड़े थे। नर्सरी के पीछे बांउड्री के कांटेदार तारों के पास काका जमीन पर पड़े कराह रहे थे। उनके माथे से खून निकल रहा था। बच्चे घबरा गए...।
‘‘काका...काका...ओ काका....।’’
‘‘वो...वो...वो...स...र...ला...।’’ काका ने सड़क के दूसरी ओर हाथ उठाकर किसी तरह कहा और बेहोश हो गए । बच्चों ने उस ओर देखा, कांटेदार तारों के उस पार सड़क पर सरला......।
कंचन और इंदु दौड़कर सरला की तरफ गए....। वह पीठ के बल पड़ी थी । उसके सिर के पिछले भाग की तरफ ढेर सारा खून बहकर जमीन पर फैला हुआ था... । उसका स्कर्ट एक तरफ पड़ा था।
काका और सरला का यह हाल देखकर बच्चों की तो घिग्घी बंध गई। काटो तो खून नहीं। एक शब्द भी नहीं बोल पा रहा था कोई। कंचन ने जैसे-तैसे स्कर्ट उठाकर उसके शरीर को ढका। यह जगह बिल्कुल सुनसान थी। यहां दिन में भी कोई नहीं आता था। एक ओर किसी फेक्ट्री की ऊंची दीवार, दूसरी ओर काका की नर्सरी के बड़े-बड़े पेड़। यहां वैसे भी अंधेरा जल्दी महसूस होने लगता था। और अब तो अंधेरा पूरी तरह उतर ही चुका था। बच्चे बुरी तरह घबरा रहे थे। इंदु तो डर के मारे रोने लगी। राज कांप रहा था। कंचन और दिनेश का तो दिमाग जैसे सुन्न ही हो गया था ।
तभी किसी वाहन की लाइट पड़ी। देखा तो दूर से एक रिक्षा आ रहा था, पास आकर रूका। ‘‘अरे...किरण....राज....तुम...!’’
संयोग कि देवयोग, ये तो गोपाल था ।
‘‘गोपाल भैया.....।’’ किसी तरह कंचन ने कहा और उस ओर इशारा किया।
गोपाल, कंचन के बाबूजी के दफ्तर में चपरासी था। छुट्टी के बाद आटो रिक्षा चलाता था। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई सारा माजरा समझ गया। झटपट नर्सरी गया। वहां से एक फोन उसने पुलिस को किया, दूसरा कंचन के घर। बच्चों को उसने भीतर काका के घर में बिठाया, खुद काका और सरला के पास खड़ा हो गया। पुलिस के पहले पहुंचे कंचन के बाबूजी। उनके साथ थे इंदु और सरला के पापा। सब ऐसे गंभीर थे कि बच्चों की तो कुछ देखने पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। डरे हुए तो पहले से ही थे।
कंचन के बाबूजी सब बच्चों को घर छोड़ने आए। वे रास्ते भर चुप थे। बच्चों को छोड़कर उल्टे पैरों लौट गए। अम्मा तो रास्ता ही देख रही थी। जैसे ही बच्चे आए, उन्हें दरवाजा बंद करने का कहकर सरला के घर चली गई।
‘‘कंचन क्या हो गया सरला को....काका को किसने मारा......?’’ राज ने पूछा
‘‘पता नहीं...कोई कुछ बोलता नहीं...।’’ वह भी कुछ समझ नहीं पा रही थी।
‘‘हमें कोई कुछ बताता क्यों नहीं ?’’ राज चुप नहीं हो रहा था जबकि कंचन का मन बात करने नहीं था।
‘‘मुझे क्या पता ! तू सरला के घर जा...वहां अम्मा हैं....पूछ ले उनसे...।’’ कंचन ने चिढ़कर कहा।
और राज सचमुच ही उठकर चलने को हुआ।
‘‘ठहर मैं भी आती हूं।’’ कंचन भी उठी। बाहर से कुंडी लगाकर दोनों सरला के घर की तरफ चले। उनके घर का दरवाजा उढ़का हुआ था। राज ने धक्का दिया तो खुल गया। भीतर सरला की मम्मी फूट-फूटकर रो रही थी। अम्मा और इंदु की मम्मी उन्हें समझाकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी।
राज और कंचन भीतर चले गए -‘‘अम्मा.....।’’
‘‘चलो बेटा....।’’ कहते हुए अम्मा उठ खड़ी हुई और अपने साथ दोनों को बाहर ले आई।
‘‘घर जाओ बेटा...।’’ बाहर आकर उन्होंने समझाया।
‘‘अम्मा, सरला को क्या हुआ...? काका को क्या हुआ ?’’ राज ने पूछा।
‘‘कुछ नहीं बेटा। बाबूजी और सब लोग अस्पताल गए हैं ना उनके पास !’’ अम्मा ने फिर समझाया।
‘‘लेकिन...अम्मा...वो...वो...वो...वो...’’ राज अटकने लगा तो कंचन ने बात पूरी की - ‘‘अम्मा...क्या हुआ.....? सच बताओ ना !’’
‘‘बेटा, कुछ बदमाशों ने उन्हें मारा है। अब तुम घर जाओ।’’ अम्मा उन्हें लगभग घसीटती हुई घर ले आई और भीतर करके दरवाजे की कुंडी बाहर से चढ़ाकर उल्टे पैरों सरला के यहां लौट गई।
‘‘किसने मारा होगा सरला और काका को...! कौन बदमाश थे वो...।’’ कंचन ने राज से बात करके अपने मन की व्यथा को कम करना चाहा।
‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत डर लग रहा है।’’ राज की घबराहट अभी भी कम नहीं हुई थी।
इसी तरह के अनसुलझे सवाल दोनों आपस में तब तक करते रहे जब तक नींद ने उन्हें अपने आगोश में नहीं ले लिया। बाबूजी-अम्मा कब आए ? देर रात तक क्या होता रहा ? मासूम बच्चों को कुछ नहीं पता।
अगले दिन सुबह उठे तो फिर अम्मा से पूछने लगे। अम्मा ने केवल इतना कहा- ‘‘काका और सरला को अस्पताल ले गए हैं...और तुम दोनों तैयार होकर स्कूल जाओ।’’
‘‘और हां...स्कूल में किसी से भी इस बारे में कोई बात मत करना....और आपस में भी नहीं, समझे...।’’ बाबूजी ने बहुत जोर देकर कहा।
राज और किरण उतना भर ही समझे जितना बाबूजी ने कहा था। मगर वे तो वह सब कुछ जानना समझना चाहते थे जो उन्हें नहीं बताया जा रहा था या उनसे छुपाया जा रहा था। कंचन ने गौर किया कि बाबूजी गहरे सोच में डूबे हैं। तभी उन्होंने अम्मा के पास जाकर धीरे से कुछ कहा। अम्मा ने सहमति में गरदन हिलाई। फिर वे राज और कंचन की तरफ रूख करके बोली - ‘‘ऐसा करो, आज तुम दोनों स्कूल मत जाओ...घर पर ही पढ़ाई करो।’’
‘‘और हां...अम्मा को परेशान मत करना। मैं जरा अस्पताल तक होकर आता हूं।’’ इतना कहकर बाबूजी निकल गए ।
‘‘अम्मा, मैं इंदु के यहां से आती हूं।’’ कहकर अम्मा का जवाब सुने बिना कंचन तीर सी निकली और जा पहुंची इंदु के घर। पीछे-पीछे राज भी आया।
‘‘ओह बाबूजी ! आप यहां बैठे हैं ? आप तो अस्पताल जा रहे थे ना !’’ बाबूजी को देख कंचन के मुंह से निकला।
‘‘हां बेटा, मैं और गणेश भाई साथ ही जाएंगें...अभी निकल ही रहे हैं।’’
कंचन भीतर पहुंची । इंदु और दिनेश को उसकी मम्मी यही हिदायत दे रही थी ‘‘देखो, इस बारे में किसी से कोई बात मत करना।’’ उन दोनों को भी आज स्कूल नहीं भेजा गया था। चारों हैरान थे और परेशान भी।
‘‘मम्मा, हम सरला और काका को देखने अस्पताल जा सकते हैं ?’’ इंदु ने अपनी मम्मी से कहा तो बाकी तीनों भी उससे सहमति का स्वर मिलाने लगे।
‘‘तुम चारों पढ़ाई करो...और हां कंचन...राज...तुम भी अपने घर जाओ और पढ़ो ।’’ इंदु की मम्मी ने कहा
कंचन और राज घर लौट आए । अम्मा नाराज हो रही थी ‘‘तुम अब कहीं नहीं जाओगे और किसी से कोई बात नहीं करोगे, चुपचाप पढ़ने बैठ जाओ।’’ अम्मा ने गुस्से से कहा तो दोनों किताब खोलकर पढ़ने बैठ गए । मगर मन कल की घटना और बड़ों के अजीब व्यवहार पर दौड़ता रहा ।
दोनों बुरी तरह चकरा गए जब अम्मा ने कहा ‘‘देखो कभी पुलिस आए और कुछ पूछे तो बताना मत कि कल तुम सरला के साथ खेल रहे थे या काका की नर्सरी पर गए थे...समझे !’’
‘‘पर हम तो गए थे...।’’ कंचन ने कहा तो अम्मा ने उसे बुरी तरह डांट दिया ‘‘जैसा कहा है वैसा करो। ज्यादा दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं है...।’’ फिर वे बड़बड़ाने लगी ‘‘हरिश्चंद का सत तो इन्हें ही चढ़ा है।’’
कंचन और राज हैरान थे। वे पूछना चाहते थे, पुलिस क्यों आएगी ? और क्या पूछने वाली थी और उसे सच क्यों नहीं बताना है ? मगर अम्मा की डांट से सहमे हुए दोनों फिर किताब खोलकर बैठ गए।
‘‘खाना खा लेना। मैं सरला के यहां जा रही हूं।’’ जल्दी-जल्दी काम निपटा कर अम्मा सरला के यहां चली गई।
राज और कंचन ने किताब एक तरफ रख दी। भूख तो थी नहीं। अपनी सोच से उपजे उन प्रश्नों को, जिनके जवाब दोनों के पास नहीं थे, एक दूसरे से पूछ-पूछकर अपने मन के भारीपन को हल्का करने की कोशिश करने लगे । बात जो भी है, बहुत गंभीर है, यह तो वे समझ रहे थे । मगर क्या है, यह नहीं जान पा रहे थे । काका और सरला की शारीरिक अवस्था तो उन्होंने अपनी आंखों से देखी थी । मगर पुलिस की बात....? सबसे छुपाने की बात...? उनकी समझ के बाहर थी । जब प्रश्नों का सिलसिला खतम हो गया तो दोनों गहरे सोच में डूबकर, कुछ बाहर लाने की नाकाम कोशिश करने लगे ।
आज का अखबार टेबल पर ही पड़ा था। कंचन ने यूं ही उठा लिया और अनमने मन से देखने लगी। अंदर के पेज पर एक हेडलाइन पर नजर पड़ते ही वह चौंक गई-
‘नर्सरी के पास बालिका से बलात्कार के बाद हत्या, वृद्ध घायल’
जल्दी से पूरी खबर पढ़ी और पढ़कर हतप्रभ रह गई । लिखा था - ‘‘कल शाम कालका माता मंदिर के पास स्थित काका की नर्सरी के पास अकेली जा रही ग्यारह वर्षीय बालिका की अज्ञात बदमाशों ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी । घटना को देखकर शोर मचाने वाले वृद्ध नारायणप्रसाद मिश्रा ‘काका’ को बदमाशों ने सिर पर भारी पत्थर मार कर घायल कर दिया। ‘काका’ की हालत गंभीर है। पुलिस के अनुसार बालिका के साथ बलात्कार किया गया था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने पर मामले का खुलासा होगा।’’
खबर के साथ काका की हालत की तस्वीर भी थी ।
‘‘रा...ज...ये...दे....ख..प...ढ़......।’’ कंचन चीखी
राज ने पढ़ा और जड़ हो गया। ग्यारह वर्षीय बालिका सरला ही तो है। तो सरला की हत्या हो गई ! मगर सरला का नाम अखबार में क्यो नहीं है ? काका का तो है। और सरला तो हमारे साथ खेल रही थी। ऐसा क्यों नहीं आया अखबार में...?
कंचन की आंखों के आगे कल रात की घटना घूमने लगी। काका की हालत भी गंभीर है। वह सिर पकड़कर बैठ गई।
जरा देर बाद उसने राज से पूछा-‘‘और ये बलात्कार क्या होता है...?’’
कंचन नहीं जानती, राज भी नहीं जानता। वह चुप है।
कंचन ने राज को झिंझोड़ा...‘‘राज बता ना ! बलात्कार क्या होता है...?’’
‘‘मु...झे...मुझे नहीं....पता...।’’ किसी तरह राज के मुंह से निकला।
‘‘चल इंदु के पास चलते हैं ।’’
‘‘और उसकी मम्मी ने वापस जाने को कहा तो...?’’ राज ने शंका जताई
‘‘अरे उसकी मम्मी भी तो सरला के यहां होंगीं।’’ कंचन ने समझाया।
दोनों निकले। कंचन ने अखबार रख लिया। जाकर इंदु और दिनेश को दिखाया तो वे भी दहल गए। इंदु ने कंचन से बलात्कार का मतलब पूछा । मगर कंचन भी कहां जानती थी।
जानती तो सरला भी नहीं थी......।
मगर जो भी हुआ बुरा था...बहुत बुरा। यह तो वे चारों समझ रहे थे। चारों बहुत दुखी थे। सरला उनकी गहरी मित्र थी। बचपन से अभी तक वे सब साथ खेलत-पढ़ते रहे थे। उन्हें काका की भी चिन्ता थी। मगर उन्हें कोई कुछ बता ही नहीं रहा था। इसका अलग दुख था उन्हें। धीरे-धीरे चारों के सवाल, दुख सब मिलकर आंसुओं के रूप में बाहर आने लगे। काफी देर तक रोकर मन हलका हुआ तो पता चला सरला को एम्बुलेंस में लाए हैं। वे सरला से अंतिम विदा लेना चाहते थे मगर बड़ों ने इसकी जरूरत ही नहीं समझी। हां, इंदु के घर की खिड़की से छुपकर जितना देख सकते थे, देखते रहे, रोते रहे।
लंबे समय तक वे इस शोक में डूबे रहे। उनका मन कहीं नहीं लगता था। यह घटना रात दिन उनकी आंखों में बसी रहती थी। स्कूल भी जाते तो क्लास में उनका ध्यान नहीं होता। किताब खोलते तो अखबार की वही मनहूस खबर वाले अक्षर आंखों के आगे आ जाते।
काका को देखने घर के बड़े लोग जाते रहते। महीना भर बीत गया था पर काका कोमा से बाहर नहीं आए। ऐसा बड़ों की बातों से, उन सबकी समझ में आया। ‘कोमा’ का मतलब वे नहीं जानते थे। कंचन ने साहस करके अम्मा से पूछा तो उन्होंने बताया-‘‘काका को चोट लगने के बाद से होश नहीं आया है।’’
कंचन का मन हुआ कि अम्मा से बलात्कार के बारे में भी पूछे। मगर उनका कठोर चेहरा देखकर हिम्मत ही नहीं हुई। बड़ों की बातों से यह भी पता चला कि पुलिस को बदमाशों के बारे में कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है। काका के होश में आने पर ही कुछ पता चल पाता पर उन्हें भी तो होश नहीं आया था। पुलिस को भी उनके होश में आने का इंतजार था।
घर का माहौल भी इतने दिनों से ठीक नहीं था। अम्मा बात-बात पर डांटती टोकती रहती। इंदु के घर में भी यही स्थिति थी। पूरी गली के घरों में लड़कियों के बाहर खेलने-घूमने पर रोक लग गई। बस, घर से स्कूल और स्कूल से घर। जरा भी देर हो जाए तो घर वाले ढूंढने लग जाते। बच्चे काका से मिलना चाहते थे मगर संभव नहीं दिखता था । एक दिन चारों ने योजना बनाई और स्कूल से लौटते हुए काका को देखने अस्पताल पहुंचे। मगर अस्पताल के कम्पाउंड के भीतर घुसे ही थे कि गणेश चाचा याने इंदु के पापा मिल गए। वे चारों को भीतर ले गए। एक कमरे में पारदर्शी कांच की दीवारें थी, वहीं से बच्चों ने काका को देखा। वे बेहोश थे और नाक में नलियां लगी थी। भारी मन से चारों बाहर निकले। गणेश चाचा ने चारों को घर छोड़ा। मगर घर लौटकर, बिना बताए अस्पताल जाने के लिए चारों की जमकर पिटाई हुई।
दिन बीत रहे थे। मगर काका की तबियत में कोई सुधार नहीं था। सरला के हादसे के सदमे से बच्चे अभी उबर भी नहीं पाए थे कि होली के ठीक दो दिन पहले काका के न रहने की बुरी खबर मिली।
सारे बच्चे रो रोकर बेहाल थे। शाम को देर तक बच्चे कंचन के आंगन में काका के लगाए गुलमोहर के पेड़ से लिपटकर रोते रहे और काका के होने के एहसास से मन को भरमाते रहे। इस साल गली के किसी भी बच्चे का रिजल्ट ठीक नहीं आया। इसके बाद के साल दुर्घटना की स्मृति को धीरे-धीरे घुंघला करते रहे। बावजूद इसके, सरला के घर के आगे से निकलते हुए उनकी निगाह उस ओर उठती और वहां स्थायी रूप से लटका ताला देखकर उनका मन उदास हो जाता। इसके अलावा भी कभी भी, किसी के भी मन पर उस दिन का वह मनहूस दृश्य ज्यों का त्यों उभर आता ।
कच्चे मन पर पक्के निशान अंकित हो गए थे।

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सोमवार, 15 अगस्त 2011

स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्रीय एकता --- मीनाक्षी स्वामी

स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्रीय एकता आलेख

आजादी पाकर चौंसठ वर्ष हो गए। हमारे पास, आजादी को पाने का राष्ट्रीय आंदोलन का गौरवशाली इतिहास है। मगर इसे अंगूठा दिखाता हमारा वर्तमान हमारी एकता पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। एक उफान,-उछाल और उत्साह के साथ बहती, किलकारी मारती हुई वेगवती नदी सी राष्ट्रीय एकता इन चौंसठ सालों के अंतराल में खंड-खंड बंटकर सूखी पतली धार सी होकर ठहर ही गई है।
तब इस वेगवती नदी को कोई पार नहीं कर सकता था, बल्कि इसने तो बाहरी तत्वों को अपनी लहरों से उछाल से बाहर फेंक दिया था पर अब इसी सूखी-पतली धार को तो कोई भी पार कर सकता है। तब अंग्रेजों के विरूध्द राष्ट्रीय एकता चरम सीमा पर थी। उस वक्त भारत के सारे धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय सब ‘भारतीयों’ के रूप में उभरे थे। इसी भारतीयता की ताकत ने लंबे समय से षासन कर रहे अंग्रेजों को खदेड़कर बाहर कर दिया था।
अब प्रजातंत्र है, जनता के पास असीमित शक्ति है, फिर भी वह स्वार्थी तत्वों की कठपुतली बन देश को विघटन की ओर ले जा रही है।
यह खेदजनक है कि आज नागरिकों के बीच किसी न किसी तुच्छ आधार को लेकर अविश्वास की ऊंची दीवार खिंची हुई है। जनता के सामने न कोई आदर्श नेता है न मार्गदर्शक। इसी कारण वह राह भटक रही है।
जब नागरिक संकुचित और तुच्छ स्वार्थों से उपर उठकर ‘हम’ की भावना का अनुभव करेंगें। अपने छोटे से समूह के प्रति नहीं वरन् सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति। तभी बंधुत्व की भावना से नागरिक आपस में जुड़े रह सकेंगें।
यह कार्य चुनौती भरा है पर कठिन नहीं।
क्योंकि
सच तो यह है कि हमारी राष्ट्रीय एकता चुकी नहीं है। यह मौजूद है, हमारे भीतर स्थित प्राणों की तरह। समय-समय पर यह दिखाई भी देती है, जब हम प्राकृतिक प्रकोपों के समय सारे भेद-भाव भूलकर भारतीय हो जाते हैं। जब हम प्रेम के गुलाल और स्नेह के रंगों से भीगते हैं। ईद की सिवैयों से मुंह मीठा करते हैं। तब हम अपने विधर्मी पड़ौसी के सुख-दुख के साथी होते हैं। खासकर विदेशों में, जब हम सिर्फ भारतीय होते हैं-हिंदू, मुस्लिम, सिख, कश्मीरी या बंगाली नहीं।
यही हमारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता का सकारात्मक पहलू है, जो आशा का द्वार दिखाता है।
जरूरत है इस द्वार पर दस्तक देने की।
अभी भी देर नहीं हुई है, उजाला बाकी है बहुत, धूप भी बिखरी है। जरूरत है अपने मन-मस्तिष्क की उदारवादी खिड़कियों को खोलकर सद्भाव, प्रेम और मित्रता की रोशनी को भीतर आने देने की। तब एकता और सद्भाव की नई कोंपलें फूटेंगीं और होगा वसंत का नवपल्लवन।
इसी आशा के साथ स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

गुरुवार, 19 मई 2011

अखबारों का सच --- मीनाक्षी स्वामी

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अखबारों में घोषणा होती है
कल बारिष हो सकती है
और जनता सम्हाल लेती है
भारी भरकम रेनकोट और छतरियां
सारे के सारे कागज पोलेथिन संस्कृति में
और तैयार हो जाती है
बारिष से जूझने को
अखबार लिखते हैं
कल टेम्प्रेचर तीन था
और जनता को लगने लगती है सर्दी
ओह ! कल इतनी सर्दी थी...!
हां-हां सचमुच थी
और यही आलम होता है
तमाम संभावनाओं का
मौसम ही नहीं हर मामले में
जनता एक छोटे बच्चे सी मान लेती है
अखबारों का सच ।

बुधवार, 30 मार्च 2011

बेटियां

श्रीमती रश्मि दीक्षित, होशंगाबाद की यह कविता हाल ही में मैनें पढ़ी । मुझे अच्छी लगी, आप सबको भी अच्छी लगेगी

बोए जाते हैं बेटे उग जाती हैं बेटियां,
खाद पानी बेटों में पर लहलहाती हैं बेटियां ।

एवरेस्ट तक ठेले जाते हैं बेटे पर चढ़ जाती हैं बेटियां,
रूलाते हैं बेटे और रोती हैं बेटियां ।
   
कई तरह से गिराते हैं बेटे पर सम्हाल लेती हैं बेटियां,
पढ़ाई करते हैं बेटे पर सफलता पाती हैं बेटियां ।

कुछ भी कहें पर बेटों से अच्छी होती हैं बेटियां ।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

लड़कियां --- मीनाक्षी स्वामी

सभी को महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएं ।
आने वाले समय में सार्थक बदलाव की कामना के साथ प्रस्तुत है ये कविता


लड़कियां

    लड़कियां, पंजों के बल
    उंची खड़ी होकर
    अमरूद तोड़ लेती हैं ।
    और कुछ अमरूद, पेड़ पर चढ़कर भी ।
    अमरूद तोड़ने के लिए
    मौका आने पर
    दीवार पर भी चढ़ जाती हैं, लड़कियां ।
    और लोहे के नुकीले, सरियों वाले
    फाटक भी उलांघ जाती हैं ।
    जतन से बटोरे अमरूदों की पूंजी को
    दुपट्टे में सहेजकर
    सोचती हैं लड़कियां,
    बड़ी होकर वे ठीक इसी तरह   
     पंजों के बल खड़ी होकर,
    आकाश की अलगनी से
    इंद्रधनुष खींचकर
    अपना दुपट्टा बना लेंगीं ।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

लड़की की मुट्ठी में --- मीनाक्षी स्वामी

लड़की की मुट्ठी में   
                               
लड़की नहीं जानती
लड़की की ताकत
लड़की है नदी,
लड़की है झरना,
लड़की है पहाड़,
लड़की है पेड़,
पेड़ की डाल है लड़की
पेड़ से कटकर भी जलती है, लड़की
अलाव की आग बनकर
सुलगती है, लड़की
सुलग-सुलगकर राख नहीं होती है
सुलग-सुलगकर बनती है, लड़की
दहकता हुआ अग्निपुंज
और खाक कर देती है
समूचे डरावने जंगल को
लड़की मुट्ठी में
बंद हैं बीज
बीज सपनों के, फलों से लदे-फंदे
उंगलियों के इशारों पर
तय करती है, लड़की
हवाओं की दिशाएं
लड़की की खिलखिलाहट
लौटा लाती है बसंत

शनिवार, 29 जनवरी 2011

टिक..टिक..टिक... (कहानी) ---मीनाक्षी स्वामी

दीपशिखा की निगाह घड़ी पर पड़ी, रात के ढाई बज रहे हैं । उसे अब तक नींद नहीं आ पाई है । रात ग्यारह बजे से वह सोने के लिए लेटी है । मगर साढ़े तीन घंटों से उसकी कोशिश जारी है और सफलता अभी तक नहीं मिल सकी है । घड़ियों की लगातार चल रही टिक...टिक...रात का सन्नाटा तोड़ रही है । दीपशिखा को लग रहा है, वह इसी शोर के कारण नहीं सो पा रही है ।  एक तो इस बड़े बेडरूम में दो दीवार घड़ियां हैं और पलंग के पास इधर, बिल्कुल कान के पास...सारी घड़ियों का  शोर...उफ... टिक...टिक...टिक...टिक...उसे शोर और तेज लगा । शायद पास के कमरों में लगी घड़ियों का शोर भी उसके कानों में पड़ने लगा ।
    हर कमरे में घड़ी जरूरी है । समय को साधने के लिए । फिर टेबल घड़ी अलार्म के लिए जरूरी है । उसे याद आया बचपन में घर में केवल एक घड़ी हुआ करती थी, केवल एक रिस्ट वॉच, वो भी बाबूजी दफतर लगाकर जाते थे । बाकी, समय देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी । मोटे तौर पर रेडियो कार्यक्रमों के आधार पर तथा बीच-बीच की गई समय की घोषणा से काम चल जाता था । फिर आसपास के बच्चों को स्कूल से आते-जाते देख समय का अंदाज हो जाता था और स्कूल सध जाता था । कभी देर नहीं हुई, परीक्षा में भी नहीं ।
    आसपास के कई घरों में से घड़ी केवल मोनू के यहां थी, पुराने जमाने की दीवार घड़ी, जो हर घंटे टन-टन करके बजती थी, जितनी बजी हो उतने घंटे । आसपास के सभी लोगों का काम उसके घंटे सुनकर चल जाता । फिर बीच में जरूरत पड़ी तो उन्हें आवाज देकर पूछ लिया । इसी बहाने बातचीत भी हो जाती । मगर यह पुरानी बात है, तब इतना धीरज और सहनशक्ति थी । न पूछने वालों को खीझ होती न बताने वालों को । तब तो किसी अजनबी के पास भी यदि घड़ी हो तो टाइम पूछने के बहाने बातचीत शुरू करने का अच्छा माध्यम हो जाती थी, घड़ी ।
    पर, उन दिनों यूं हर पल का हिसाब नहीं रखना होता था । अब तो टाइम पूछने जाने का भी टाइम नहीं है । बेडरूम में भी दो घड़ियां  दीपशिखा ने इसलिए लगा दी कि सिर घुमाकर टाइम देखने में दो पल भी बर्बाद न हों । आंख उठाई और टाईम देख लिया ।
    वो दिन कब हवा हो गए, दीपशिखा ने बहुत जोर डाला दिमाग पर, मगर याद नहीं आया । उसे बस याद आया नौकरी लगने, शादी होने के बाद से घड़ी के कांटों से जिंदगी बंध गई । सुबह यदि दो मिनिट भी देर हो गई तो पूरा दिन बेकार । बस छूट जाती, अगली बस दूर से लेना होता । पतिदेव की तो और मुश्किल, वे अपनी गाड़ी से जाते, मगर दो मिनिट की देरी उन्हें बड़े जाम में फंसा सकती थी । फिर बच्चों का स्कूल । उसे लगा शहर के बड़ा होने से ही ऐसा हुआ है ।
    आज उसकी सेवानिवृत्ति के बाद की पहली रात है । बच्चे नौकरियों पर बाहर हैं । पतिदेव दुनिया में नहीं हैं । सारी बातें उसे क्रम से याद आ रही हैं । नहीं आ रही है तो बस नींद । बीते बरस कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला और आज उनचालीस साल की नौकरी और साठ साल की उम्र पूरी करके फिर वह घड़ियों की टिक-टिक में उलझी है । दीपषिखा ने तय किया कि सुबह उठकर वह सबसे पहले सारी घड़ियों को हटा देगी । तभी उसे ख्याल आया, सुबह क्यों अभी क्यों नहीं । वह तुरंत उठी और उसने फुर्ती से सारी घड़ियों के सेल निकालकर उन्हें उतार दिया । घर में शांति फैल गई । वास्तव में यही टिक-टिक उसे चिड़चिड़ा किए दे रही थी, उसने सोचा । फिर आराम से लेट गई । सचमुच उसे नींद आ गई, घड़ियों का शोर बंद हो जाने से या रात बहुत बीत जाने से ।     सुबह दीपशिखा की नींद खुली तो धूप बेडरूम की खिड़की से उसके पलंग तक आ गई थी । आदतन उसकी निगाह दीवार पर गई । ओह ! वहां से तो घड़ी मैनें ही हटाई है । दीपशिखा को याद आया । अभी शायद नौ बजे होंगे । उसने पलंग तक आई धूप से अंदाज लगाया । हुंह । कितने भी बजे हों । अब मैं घड़ी के कांटों से आजाद हूं । वह जल्दी से दो-तीन कप चाय बना, केटली में भरकर ले लाई और वहीं पलंग पर टे् सहित रखकर आराम से पीने लगी । सचमुच घड़ियों के न होने से कितना सुकून लग रहा है । दीपशिखा सोच रही है । वरना अब तक तो जाने कितनी बार घड़ी पर निगाह जाती और वह चाय के साथ इतमीनान का लुत्फ नहीं ले पाती । चाय पीकर, घड़ी रहित बाथरूम में आराम से नहाकर वह बेफिक्री से देर तक तैयार होती रही । नहाने और तैयार होने में कितना समय लगा, उसे खुद नहीं पता और वह जानना भी नहीं चाहती है। मगर सच तो यह है कि घड़ियों को हटाकर भी वह घड़ियों से मुक्त नहीं हो पा रही है ।
    हां, वह घड़ियों के न होने से उपजे सुकून को हर पल महसूस कर रही है । तैयार होकर उसने हाथ में पहले आदतन घड़ी पहनी फिर निकाल दी । फिर घूमने के इरादे से बाहर निकल आई । बस या टेक्सी...कुछ पल सोचते हुए वह फिर मुसकाई । मन ही मन उसने तय किया कि जब कहीं पहुंचने की समय सीमा न हो तो बस से बेहतर कुछ नहीं । वह बस में बैठी । बैठती तो वह रोज भी थी । मगर आज की बात और है । आज बस से कहीं पहुंचने की जल्दी उसे जरा भी नहीं है । वह इतमीनान से बैठी है । खिड़की से बाहर का नजारा उसने आज ही देखा और महसूस किया । उसने बस में बैठे लोगों पर नजर डाली । सब लोग उसी बेचैनी में बैठे हैं, जिसमें कल तक वह बैठा करती थी । वे बार-बार घड़ी देखते हैं और खीझते हैं । सबको गन्तव्य तक पहुंचने की बेचैनी है । वह मुसकाई और उसने सोचा बेचैनी से बस की गति नहीं बढ़ती । फिर उसने पास में बैठी स्त्री को देखा । उससे बात करने की गरज से टाईम पूछा । मगर टाईम बताते ही वह स्त्री बहुत बेचैन हो गई । कुछ पल बाद खड़ी हो गई मानो उसके खड़े होने से बस जल्दी पहुंच जाएगी ।
    खैर । कई स्टॉप आए और गए । वह उतर सकती थी । मगर नहीं उतरी । वह आखिरी स्टॉप पर उतरी । सामने एक बड़ा शापिंग मॉल देख वह वहीं चल दी । भीतर जाते ही खाने की चीजों की बड़ी सी नामी दुकान देख उसे भूख लग आई । पेटपूजा कर वह वहीं मल्टीप्लेक्स की टिकिट खिड़की पर जा खड़ी हो गई । ‘‘अभी जो शो होने वाला है, उसी का टिकिट दे दो ।’’ उसने कहा तो बुकिंग क्लर्क चौंका । फिर बोला ‘‘एक शो अभी चल रहा है और अगले शो में अभी टाईम है ।’’ उफ, फिर आड़े आया ये टाईम । अपनी खीझ को परे झटक वह मुसकाई । उसने अगले शो का टिकिट ले लिया और इतमीनान से बाहर आकर प्रतीक्षा करने लगी । शो शुरू होने का अंदाज उसने दूसरे लोगों को थियेटर में जाते देखकर लगाया और वह भी चली गई ।
    फिल्म देखकर निकली तो पाया कि सूरज ढलने में अभी देर है । वह घर की ओर रवाना हुई और शाम होने के पहले पहुंच गई । बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए उसने पहली बार अपने घर से सूर्यास्त देखा और देर तक देखती रही । सब कुछ अंधेरे में डूबने के बाद जब सड़क की बत्तियां जली तब वह भीतर आई । लाइट जलाने के साथ ही उसकी निगाह, दीवार पर वहां पड़ी, जहां घड़ी नहीं थी । अब वह टाईम जानना चाहती थी क्योंकि अब उसे बिटिया के फोन का इंतजार था । रोज ठीक आठ बजे उसका फोन आता है । आठ बजने में कितना समय बाकी होगा, उसे जरा भी अंदाज नहीं हो पा रहा है । एक पल को घड़ी वापस लगाने का ख्याल आया, मगर इसके साथ ही खिझानेवाली टिक-टिक भी याद आ गई । उसने सोचा मोबाइल उठाकर घड़ी देखे पर यह विचार भी उसने झटक दिया । फिर उसने रिमोट उठाया और टी.वी. चालू कर दिया । मगर तभी लाइट चली गई । वह फिर बाहर आकर बैठ गई । पता नहीं कितने बजे हैं ! बिटिया का फोन कब आएगा ! लाइट कब आएगी ! समय पता होता तो काटना आसान होता शायद...। सोचती हुई वह उबने लगी । फिर फोन की घंटी बजी और दूसरी ओर से बेटी की आवाज सुनकर वह समझ गई कि रात के आठ बजे हैं । मगर फिर भी लंबे इंतजार की ऊब शब्दों में बदलकर निकली-‘‘आज बहुत देर हो गई...मुझे चिंता हो रही थी ।’’
‘‘ओह मां ठीक आठ बजे हैं चाहों तो घड़ी मिला लो ।’’ बेटी ने कहा तो वह फिर अपनी रौ में बह चली । घड़ियों से अपनी आजादी की बात बेटी को बताते हुए वह अतिरिक्त खुश थी । मां की खुशी में बेटी भी खुश हुई मगर घड़ियों से आजाद जिंदगी की कल्पना उसे अजीब लगी । पर वह कुछ नहीं बोली।
    फिर रात का खाना खाते हुए वह टी.वी. देखती रही । और जब रीपीट सीरीयल  शुरू हुए तो उसने टी.वी. बंद कर दिया और सोने की तैयारी करने लगी । बिस्तर पर लेटते ही आदतन उसकी नजर दीवार पर पड़ी । उसे सूनापन लगने लगा ।शांति उसे काटने लगी । घोर सन्नाटा । कैसा मनहूस लग रहा है । कुछ मिसिंग है । दीवारों पर बार-बार नजर जाती । घड़ी देखते हुए समय कट जाता है, और कुछ नहीं तो यही सोचकर कि तीन घंटे हो गए नींद नहीं आई या सुबह होने में चार घंटे बाकी हैं । उसे लगा टिक-टिक की लोरी सी सुनते हुए नींद कब आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था । टिक-टिक में किसी के होने का एहसास था । कैसी लयबद्ध टिक-टिक आती थी, हर कमरे से...कैसा सुमधुर संगीत...। उसे घड़ियों की टिक-टिक याद आने लगी । उसने सोचा सुबह उठकर सबसे पहले सारी घड़ियां चालू करके लगाउंगी । तभी उसे ख्याल आया, सुबह क्यों, अभी क्यों नहीं । वह फौरन उठी और उसने फुर्ती से सब घड़ियों में सेल डालकर उन्हे उनकी जगह पर टांग दिया ।
    और इस नीरवता में घड़ियों की टिक-टिक ने उसे जीवंतता के एहसास से भर दिया । उसे अपना घर अपना सा लगने लगा, और घड़ियां अपनी सहेलियां ।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

रेल में बैठी स्त्री --- मीनाक्षी स्वामी

रेल में बैठी स्त्री                         कविता    
तेज रफ्तार दौड़ती रेल में
  बैठी स्त्री
खिड़की से देखती है
पेड़, खेत, नदी और पहाड़
पहाड़ों को चीरती
नदियों को लांघती,
जाने कितनी सदियाँ, युग
पीछे छोड़ती रेल
दौड़ती चली जाती है
स्त्री खिड़की से देखती है
मगर
वह तो रेल में ही बैठी रहती है
वहीँ की वहीँ
वैसी ही
वही डिब्बा, वही सीट,
वही कपड़े, वही बक्सा
जिसमें सपने भरकर
वह रेल में बैठी थी कभी
रेल मेँ बैठी स्त्री
बक्सा खोलती है
और देखती है सपनों को
सपने बिल्कुल वैसे ही हैं
तरोताजा और अनछुऐ
जैसे सहेजकर उसने रखे थे कभी
स्त्री फिर बक्सा बंद कर देती है
और सहेज लेती है
सारे के सारे सपने
रेल दौड़ती रहती है
पेड़, नदी, झरने
सब लांघती दौड़ती है रेल
पीछे छूटती जाती हैं सदियाँ
और रेल के भीतर बैठी स्त्री के सपने
वैसे ही बक्से में बंद रहते हैं
जैसे उसने
सहेजकर
रखे थे कभी ।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

ब्लॉग पर आने की वजह --- मीनाक्षी स्वामी

देर से ही सही पर ब्लॉग पर आ गई हू . वेसे विचार और कला अपने विस्तार के लिए तकनीक पर निर्भर होती हें इसीलिए वैश्विक स्तर पर विचारो के आदान प्रदान के लिए ये बेहतरीन माध्यम के रूप में ब्लॉग जगत में आकर भीतर से समर्थ महसूस कर रही हू . आते ही जिस तरह से तुरंत स्वागत की प्रतिक्रिया मिली उससे बहुत उत्साहित भी हू.

अपने ब्लॉग का नाम भूभल रखा है . भूभल  याने चिनगारियो से युक्त गर्म राख. हर रचनाकार के भीतर  एसी   ही आग होती है . जो विरोधाभासो पर जब  प्रतिक्रिया करती है तो रचना का जन्म  होता है. और भूभल  मेरे ताजातरीन प्रकाशित उपन्यास का भी नाम है. 

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

अपनी बात --- मीनाक्षी स्वामी

मीनाक्षी स्वामी
मैंने समाजशास्त्र में एम. ए. किया है और मुस्लिम महिलाओं की बदलती हुई स्थिति पर पीएच. डी. । मध्यप्रदेश शासन के अधीन समाजशास्त्र की प्राध्यापक हूं । लेखन मेरा शौक है । भूभल ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषा का प्रचार उद्देश्य है। मेरी लगभग 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें चर्चित हैं - अच्छा हुआ मुझे शकील से प्यार नहीं हुआ (कहानी संग्रह), भूभल (उपन्यास ),लालाजी ने पकड़े कान ( किशोर उपन्यास ),अन्य पुस्तकें-भारत में संवैधानिक समन्वय और व्यावहारिक विघटन, राष्ट्रीय एकता और अखंडताः बंद द्वार पर दस्तक,कटघरे में पीड़ित,अस्मिता की अग्निपरीक्षा ,पुलिस और समाज,मानवाधिकार संरक्षण ओर पुलिस,खंडित होते पुलिस के मानवाधिकार ,बीज का सफर ,बहूरानियां,मूमल महेन्द्र की प्रेम कथा इत्यादि।
लगभग हर विधा में हर वर्ग के लिए रचनाकर्म करते हुए मुझे राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान और स्वीकृति के रूप में रचनाओं पर भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार (हर विधा में हर वर्ग के लिए ) मिले । इनमें उल्लेखनीय हैं-
-केन्द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा फिल्म स्क्रिप्ट पर राष्ट्रीय पुरस्कार, 1993 ।
-केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पं. गोविन्दवल्लभ पंत पुरस्कार, 1993 और 2005 ।
-सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा भारतेन्दु हरिष्चंद्र पुरस्कार, 1995 ।
-संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा पं. मोतीलाल नेहरू पुरस्कार, 1995 ।
-मध्यप्रदेश विधानसभा द्वारा डॉ. भीमराव आम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, 1995 ।
-मध्यप्रदेश जनसम्पर्क विभाग द्वारा स्वर्ण जयंती कहानी पुरस्कार, 2007 ।
-आकाषवाणी, नई दिल्ली द्वारा रूपक लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार, 1995 ।
-मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा नवसाक्षर साहित्य लेखन के लिए कई पुस्तकों पर राष्ट्रीय पुरस्कार।
-एन.सी.ई.आर.टी.,नई दिल्ली द्वारा बाल साहित्य व चिल्ड्न्स बुक ट्स्ट द्वारा किशोर साहित्य के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1995 ।
-महामहिम राज्यपाल मध्यप्रदेश तथा सहस्त्राब्दि विश्व हिंदी सम्मेलन में उत्कृष्ट लेखकीय योगदान के लिए सम्मानित, 1998 व 2000 ।
कई पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं व अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ ।
केंद्र सरकार, मध्यप्रदेश और राजस्थान सरकार के विभिन्न पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में मानवाधिकारों पर अनेक व्याख्यान भी हुए है।