मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

डा. मीनाक्षी स्वामी - भारत की सामासिक संस्कृति और अल्लामा इकबाल

राष्ट्रकवि  दिनकर  ने  इकबाल  के  लिए  कहा था ‘इकबाल  की  कविताओं  से, भारत की सामासिक संस्कृति को बल मिला था।’
    ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलसितां हमारा’ जैसी कालजयी और भारत की सामासिक संस्कृति को बल देने वाली इकबाल की यह शायरी आज भी हिंदुस्तान की जनता के दिलों पर राज कर रही है।
इकबाल से पहले थोड़ी सी चर्चा संस्कृति पर। संस्कृति क्या है?

    संस्कृति किसी भी राष्ट्र या देश की वे उपलब्धियां हैं, जो उसने सदियों से अर्जित की होती हैं, जिनसे उसके इतिहास, समाज, राजनीति, आर्थिक, प्राकृतिक परिवेश, आचार विचार, ज्ञान विज्ञान, दार्शनिक विचारधाराओं, धर्म, लोक कलाओं और जीवन आदि के बारे में पता चलता है। संस्कृति का सम्बंध जहां मानव के शारिरीक, मानसिक, बौध्दिक शक्तियों के विकास के साथ है, वहीं धर्म, कला, दर्षन और साहित्य भी इसके अभिन्न अंग हैं। यह किसी भी देश की आत्मा और प्रेरणा स्त्रोत है। संस्कृति को राष्ट्रीयता से अलग नहीं किया जा सकता है। संस्कृति मानव समाज के संस्कारों का परिष्कार और परिमार्जन है। यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य के लिए जो भी मंगलकारी है, वह संस्कृति का अंग है।
और अब बात भारत की सामासिक संस्कृति की।
यह तो सभी जानते हैं, स्वीकारते हैं कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति में से है, जिसने युगों-युगों तक मानवता को मार्गदर्शन दिया। भारतीय संस्कृति मानवीय मूल्यों के सबसे अधिक निकट है क्योंकि इसमें हजारों वर्षों के सामाजिक अनुभवों का समावेश है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार धार्मिक और आध्यात्मिक रहा है। यह गंगा के प्रबल प्रवाह की तरह है जिसमें अनेक विदेशी संस्कृतियां आई और सहायक नदियों की तरह विलीन हो गई। अनेक उतार-चढ़ाव, संकटों में भी भारतीय संस्कृति की अस्मिता कायम रही है।
यही कारण है कि विश्व की दूसरी समकालीन संस्कृतियां बगैर कोई चिन्ह छोड़े काल की धारा में समाहित हो गई। भारतीय संस्कृति समयानुसार थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ आज भी स्थिर है।
अल्लामा मोहम्मद इकबाल ने भारतीय संस्कृति की इसी महिमा को बताते हुए कहा था
        ‘यूनानो मिस्त्र रोमां सब मिट गए जहां से,
        बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा।
            कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
            सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहां हमारा।’
    इसी प्रकार उनकी रचनाएं ‘नया शिवालय’, ‘तराना ए हिंद’, तस्वीरे दर्द आदि भी भारत की सामासिक संस्कृति के समर्थन में हैं।
    इकबाल का जन्म 1873 में और मृत्यु 1938 में हुई। उनके दादा सहज सप्रू हिंदू काश्मीरी पंडित थे, जो बाद में सियालकोट आ गए। शुरूआती शिक्षा सियालकोट में लेने के बाद लाहौर से उन्होंने एम.ए. किया, केम्ब्रिज में दर्षन का अध्ययन किया और म्युनिख से डाक्टरेट की उपाधि ली। डाक्टरेट का विषय ईरानी रहस्यवाद था। 1908 में वे भारत लौटे और लाहौर में बेरिस्टरी शुरू की। मगर उनका मन कविता और दर्शन में ही रमा। लाहौर में उन दिनों मुशायरों की धूम मची हुई थी। इकबाल ने भी उनमें शामिल होकर अपना कलाम सुनाना शुरू किया और शोहरत की बुलंदियां छूने लगे।
    इस्लाम की जागृति पर उनकी श्रध्दा जरूर थी पर उनके विचारों में राष्ट्रीयता भरपूर थी। वे हिंदू मुस्लिम एकता के हामी और भारतीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। ‘बांगेदरा’ में इस्लाम के साथ हिंदू और सिक्ख मत के प्रति भी आदर के सशक्त भाव झलकते हैं। उनकी राम और नानक पर लिखी कविताएं भारत की सामासिक संस्कृति के समर्थन का प्रमाण हैं। बांगेदरा राष्ट्रीय काव्य है। उसकी हर पंक्ति में राष्ट्रीय एकता के लिए बेचैनी दिखाई देती है।
    ‘नया शिवालय’ के भाव बहुत ही तेजस्वी और पवित्र हैं। ये उस बेचैन कवि के भाव हैं जो इंसान से कहना चाहत हैं कि तुम्हारा आधार वह मिट्टी है जिस पर मंदिर मस्जिद खड़े हैं और यह मिट्टी मंदिर मस्जिद दोनों से बढ़कर पवित्र है।
    वे लिखते हैं  ‘मिट्टी की मूरतों समझा है तू, खुदा है।
            खाके वतन का मुझको हर जर्रा देखता है।’
    वास्तव में मातृभूमि सभी धर्मों से ऊपर है।    
    तस्वीरे दर्द में उन्होंने हिंदू मुस्लिम एकता की प्रतिज्ञा की थी-
            ‘पिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों को,
            जो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसां करके छोड़ूंगा।’
    इकबाल ने यूरोप में रहते हुए सांस्कृतिक विचार का एक खाका तैयार किया था। वहां उन्होंने तीन बातें देखी, एक तो यह कि यूरोपवासी उत्साही और क्रियाशील हैं। जहां उन्हें आगे बढ़ने में बाधा दिखती है, निर्मूल कर देते हैं। दूसरी कि वे अवसरों का उपयोग करके आगे बढ़ जाते हैं। निरंतर प्रगति करते हैं। तीसरी जो बात देखी, वह उन्हें ठीक नहीं लगी कि वैज्ञानिक प्रगति, सुख भोग के अनेक साधनों के बाद भी उनका हृदय खोखला और आत्मा रिक्त थी।
    इस भयानक पक्ष को देखकर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आंख मूंदकर यूरोप की नकल करने से विनाश ही होगा।
    इन यूरोपीय सांस्कृतिक अनुभवों का साया उनकी कविता पर भी पड़ा। उन्होंने अपनी कविताओं में मनुष्य को कर्मठ बनने और बाधाओं को कुचलकर असंभव लक्ष्य पाने की प्रेरणा दी।
    बाले जिबराल में वे कहते हैं ‘सितारों से आगे जहां और भी हैं।
                    तू शाहीं है परवाज है काम तेरा।
                    तेरे सामने आसमां और भी हैं।’
    इसी तरह एक बंद है-
                    ‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
                    खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।’
    वे जीवन में सतत क्रियाषीलता की प्रेरणा देते रहे। बाले जिबराल में ही-
                    ‘नहीं साहिल तेरी किस्मत में अय मौज,
                    उमड़कर जिस तरफ चाहे, निकल जा।’
    खतरों से घबराने को इकबाल ने सबसे बड़ी पराजय माना और नौजवानों को खतरों से लड़ने के लिए प्रेरित किया-
                    ‘खतरपसंद तबियत को साजगार नहीं
                    वे गुलसितां कि जहां घात में न हो सैयाद।
                    मुझे सजा के लिए भी पसंद नहीं वो आग,
                    कि जिसका शोला न हो तुन्दो-सरकशो-बेबाक।’
                                     (तेज, बागी, निडर)
    दरअसल शायरी में इकबाल का कोई मुकाबला ही नहीं था। उनकी शायरी का जब अंग्रेजी में अनुवाद हुआ तो उनकी ख्याति इंग्लैंड तक पहुंच गई। उससे प्रभाति होकर जार्ज पंचम ने उन्हें सर की उपाधि दी। बाद में उनकी शायरी का यूरोप की दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ।
    इकबाल की जुबान ही शायरी है। जो कहा वही शेर हो गया। राम और नानक पर लिखने के साथ ही उन्होंने धार्मिक सौहार्द के लिए शिवाला जैसी रचनाएं लिखी। आजादी और राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत रचनाएं लिखी। बच्चों को प्रेरणा दी।
    शिक्षा को भी उन्होंने अपनी शायरी में महत्वपूर्ण बताया। ‘शहद की मक्खी’ रचना में वे किताबें पढ़ने की प्रेरणा भी देते हैं-
            ‘रखते हो अगर होश तो इस बात को समझना।
            तुम शहद की मक्खी की तरह इल्म को ढूंढो।
            ये इल्म भी एक शहद है और शहद भी ऐसा
            दुनिया में नहीं शहद कोई इससे मुसफ्फा (साफ)।
            फूलों की तरह अपनी किताबों को समझना,
            चसका हो अगर तुमको भी कुछ इल्म के रस का।’
    आज शिक्षा का, साक्षरता का प्रचार-प्रसार हो रहा है, यह भी इकबाल का सपना था, जो साकार हो रहा है। ‘परिन्दे की फरियाद’ रचना के इस बंद में गुलामी का दर्द बयान होता है-
            ‘आता है याद मुझको गुजरा हुआ जमाना,
            वे बाग की बहारें, वो सबका चहचहाना।
            आजादियां कहां अब वो अपने घोंसले की
            अपनी खुशी से आना, अपनी    खुशी से जाना।’
    भारत के गौरव को दर्शाते हुए उन्होंने लिखा-
            ‘चिश्ति ने जिस जमीं पे पैगामे हक (सच, खुदा) सुनाया,
            नानक ने जिस चमन में वहदत (एकता) का गीत गाया।
            तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया,
            मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है।’
    धार्मिक एकता की चाहत को प्रकट करती ‘नया शिवालय’ रचना का ये बंद है-
            ‘आ गैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें,
            बिछड़ों को फिर मिला दें, नक्षे दुई मिटा दें।
            सूनी पड़ी हुई है, मुद्दत से दिल की बस्ती,
            आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें।’
    इकबाल की कालजयी पंक्तियां ‘मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’ तब सार्थक हो जाती हैं, जब देशवासी समय-समय पर आपसी भाईचारे की मिसाल देते हैं। जब प्राकृतिक प्रकोपों के समय सारे भेद-भाव भूलकर सब भारतीय हो जाते हैं। जब प्रेम के गुलाल और स्नेह के रंगों से भीगते हैं। ईद की सिवैयों से मुंह मीठा करते हैं। जब विधर्मी पड़ौसी के सुख-दुख के साथी होते हैं। जब हजारों-हजार मुस्लिम वाहन चालक हिंदू यात्रियों को तीर्थ यात्रा करवाते हैं और हिंदू भी अपने-अपने स्तर पर हज करने में उनकी मदद करते हैं।
    यही वे जीवन मूल्य हैं जो भारत की सामासिक संस्कृति के प्रतीक हैं और जिनका स्वप्न आरम्भ में इकबाल ने देखा था।
    दुर्गा और गणेशजी की मूर्ति बनाने से लेकर राखी के बंधन बनाने की छोटी सी प्रक्रिया तक हिंदू मुस्लिमों को एक पवित्र रेशमी डोर के बंधन में बांधे है। लाख की चूडि़यां बनाते हजारों-हजार मुस्लिम स्त्रियों के हाथ व दिल हिंदू स्त्रियों के अखंड सौभाग्य की कामना करते हैं। इस देश की सांस्कृतिक परम्पराओं ने आज भी सबको एक सूत्र में बांध रखा है। इकबाल भी इसी के पैरोकार रहे हैं।
    धार्मिक एकता के साथ उनकी शायरी में दूसरे धर्मों का आदर भी दिखाई देता है, जो भारत की सामासिक संस्कृति में उनके योगदान को पुष्ट करता है-
            ‘इस देश में हुए हैं हजारों मलक सरिश्त (फरिश्ते जैसे),
            मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नामे हिंद।
            है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज़
            अहले नज़र समझते हैं उसको इमामे (मुखिया) हिंद।’
    इकबाल की रचनाओं से उस काल में भारत की सामासिक संस्कृति को बल मिला था। मगर आज भी जबकि भारत में साम्प्रदायिक संघर्ष कभी भी उन्माद की शक्ल ले लेते हैं, इकबाल की शायरी, उनके तराने सामयिक हो जाते हैं। इल्म का महत्व उन्होंने उस काल में बताया था आज भी स्थिति वही है। आखिर इल्म ही रस ही व्यक्ति को हर परिस्थिति में मददगार हो सकता है।
    आज भारतीय समाज पर विदेशी संस्कृति इस तरह हावी हो गई है कि हीरे-मोती और पत्थर में भेद करने की विवेक दृष्टि खो गई है, चुंधिया गई है। इकबाल ने यूरोप में रहने के दिनों में यूरोपवासियों के खोखले हृदय और आत्मा को महसूस करके निष्कर्ष निकाला था कि आंख बंद करके उनकी नकल करने से विनाश ही होगा। विवेकानंद ने भी चेताया था ‘हमें पश्चिम का अंधानुकरण न करके विवेक से काम लेना होगा। उनका अमृत हमारे लिए विष भी हो सकता है।’
और इकबाल का लोकप्रिय तराना ए हिंद भी यही कहता है-
            ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।’
(मध्यप्रदेश के शिवपुरी में भारत की सामासिक संस्कृति और इकबाल विषय पर  व्याख्यान )
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                                              सोचा न था कि शिवपुरी इतना खूबसूरत होगा।



   

रविवार, 19 जनवरी 2014

साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश की मासिक पत्रिका "साक्षात्कार" में प्रकाशित साक्षात्कार - मीनाक्षी स्वामी

 

मित्रों, पिछले दिनों साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश की मासिक पत्रिका "साक्षात्कार" में मेरा साक्षात्कार प्रकाशित हुआ।
साहित्य अकादमी के प्रति आभार के साथ















आप सभी मित्रों की मूल्यवान प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।



सोमवार, 7 जनवरी 2013

उपन्यास भूभल से अंश मीनाक्षी स्वामी







(मेरा उपन्यास ‘भूभल’ वर्ष 2011 में सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। आज दिल्ली गेंग रेप की घटना में जन जागरण का कानून निर्माताओं पर दबाव बन रहा है, ठीक इसी प्रकार के जन आंदोलन द्वारा कानून निर्माताओं पर दबाव और कानूनों में बदलाव का विस्तृत कथात्मक विवरण उपन्यास ‘भूभल’ में है।
इसे मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ व अखिल भारतीय विद्वत् परिषद वाराणसी द्वारा कादम्बरी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
मित्रों के आग्रह पर उपन्यास के ये अंश प्रस्तुत हैं। )

फ्लेप से

    किसी भी महिला के साथ जबरिया यौन सम्बंध वैश्विक परिदृश्य का दिल दहला देने वाला सच है। इसका सामाजिक पहलू तो कड़वा है ही, कानूनी पहलू भी स्त्री के पक्ष में खड़ा दिखाई देने के बावजूद उसे शिकार बनाने के इस खेल में अनजाने ही शामिल हो जाता है। उपन्यास इस कड़वे निर्वसन सत्य को बेबाकी से सामने रखता है।
    ‘भूभल’ अर्थात चिंगारियों से युक्त गर्म राख, निरंतर प्रज्जवलित रखने के लिए इसमें कंडा (उपला) दबा दिया जाता है। इसे जब चाहे हवा देकर फिर से लौ बनाया जा सकता है।


अपनी बात से
   
    नारी अस्मिता और स्वतंत्रता से जुड़ा अहम प्रश्न है-दैहिक स्वतंत्रता का। अपने चाहने पर वह किसी से सम्बंध बना पाती है या नहीं? इससे भी बड़ा प्रश्न है कि न चाहने पर वह इसे रोक पाती है या नहीं? मगर इस प्रश्न के उत्तर में समूचे समाज की प्रतिक्रिया मुखौटे बदलकर, एक जैसी ही होती है तो यकीन होने लगता है कि सामाजिक ढांचे और स्थितियों को ही पक्षपातपूर्ण साजिश के साथ विकसित किया गया है।
    दूसरी ओर न्याय देने को प्रतिबध्द कानून, भ्रष्ट व्यवस्था से रिसता, पुलिस की वर्दी में गुम होता, वकीलों के काले कोट में जाकर छुप जाता है। न्याय पाने को आगे बढ़ा पीडि़त ठगा और छला रह जाता है क्योंकि न्यायालय में जो मिलता है वह मात्र निर्णय होता है, न्याय नहीं। यही हकीकत है।
    प्रजातांत्रिक व्यवस्था, स्वतंत्रता और समानता के तमाम दावों के बावजूद आज भी न्यायालय पुरुषों के ही हैं। न्याय व्यवस्था भी स्त्रियों को शिकार बनाने के इस खेल में अनजाने ही षामिल है जिसके चलते स्त्री की लड़ाई इतनी दारूण और यंत्रणापूर्ण है कि उसमें हर बार विजय की संभावना टूटती ही अधिक है।
    मगर हार के डर से, जूझने दूर रहने वाला समाज ठहर जाता है। जब जूझना ही नियति है तो किसी न किसी को तो यह युध्द जारी रखना ही होगा। यथार्थ का दूसरा पहले यह भी है कि जब लड़ते अस्तित्व को बनाए रखने की अनिवार्य शर्त हो और एकमात्र विकल्प भी, तब सामूहिक आहुति फलदायी हो सकती है और सामूहिकता केवल स्त्रियों की नहीं, समूचे समाज की, जिसके सदस्य स्त्री-पुरुष दोनों हैं। दरअसल यह समस्या केवल स्त्री की नहीं समूचे समाज की है तो इसका निराकरण भी स्त्री-पुरुष दोनों को मिलकर ही करना होगा। 
    निस्संदेह यह उपन्यास उन बातों को लेकर नहीं लिखा गया है, जो आगे बढ़ते समय के साथ पीछे छूटती जा रही हैं बल्कि समय के साथ नहीं छूटने वाली उन बातों को लेकर है जिन्हें अब तक छूट जाना चाहिए था।     



उपन्यास भूभल से अंश

    कंचन इन मामलों में जमीनी आंदोलनों में भरोसा करती थी। अपने इसी सोच के चलते उसने श्रीमती चटर्जी को एक ई मेल किया। इस निवेदन के साथ कि ‘लिखा पढ़ी का अपना महत्व है मगर सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के लिए जन आंदोलन ज्यादा कारगर होते हैं। जन शक्ति के जुड़ने से, लिखी हुई बातें ज्यादा प्रभावशाली हो पाती हैं। प्रजातंत्र में जनमत सब पर भारी है। जन जागृति से प्रभावशाली अपराधी भी दंडित हो सकते हैं। उनके हौसले पस्त हो सकते हैं। तब न्याय के लिए लड़नेवालों के मनोबल में भी वृध्दि होगी। साथ ही कंचन ने इसके लिए एक कार्य योजना का जिक्र भी अपने मेल में किया। इसके अनुसार आंदोलन के दो चरण होंगे-पहले बलात्कार कानून में संशोधन का मसौदा बनाना, दूसरे में सबको साथ लेकर उसे जन आंदोलन बनाना ताकि सरकार पर इस संशोधन का दबाव बन सके। और इस आंदोलन की खास बात यह होगी कि यह केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं होगा। इसमें पुरुषों को भी जोड़ना होगा। विषेष महिला न्यायालय के अनुभव से मेरी राय में यह समस्या महिलाओं की लगती है, मगर इससे महिला से जुड़े पुरुष भी प्रभावित होते हैं।’
    मेल करते-करते कंचन को महसूस हुआ कि यह लड़ाई उसकी अकेली की नहीं, पूरी दुनिया की है। और जब अगले ही दिन कंचन ने अपने मेल बाक्स में राष्ट्रीय महिला आयोग का जवाब देखा तो उसका यह एहसास भरोसे में बदल गया।
    उसके विचारों से प्रभावित होकर श्रीमती चटर्जी ने लिखा था कि ‘आप संशोधित कानूनों और जन आंदोलन के लिए अपील का मसौदा तैयार करें। आपका सुझाव प्रशंसनीय है। आपके सहयोग से हम इसे कार्य रूप में बदल सकेंगें।’
    पढ़कर कंचन उत्साह से भर गई। दुनिया की प्रताड़ना, अपनों द्वारा दिए गए आघातों, सबसे ऊपर उठकर एक मसौदा तैयार करने लगी, जिसे सारे सामाजिक संगठनों को, बुध्दिजीवियों को, समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाना था। एकाग्रचित्त होकर वह अपने काम में डूबी थी।
    तभी दरवाजे की घंटी बजी।
    फिर अपनों का आघात........उनके जाने के बाद कंचन की एकाग्रता भंग हो गई। ‘क्या इस दुनिया में सारे पुरुष ऐसे ही सोचते हैं? जबरदस्ती से दूषित हुई देह क्या वास्तव में दूषित है? जोर-जबरदस्ती के मामले में कोई स्त्री मन-प्राण से तो समर्पित होती ही नहीं है। क्या दैहिक पवित्रता ही सब कुछ है? प्रश्न केवल कौमार्य का तो नहीं, आत्म विश्वास, भरोसे और जबरदस्ती का भी है। बलात्कार केवल शरीर का तो नहीं मन, प्राण और आत्मा का भी तो हुआ है, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का भी तो हुआ है।’
    कंचन का हृदय चीत्कार उठा।
    वह फिर काम में मन लगाना चाहती है, बार-बार कागज कलम उठाती है फिर मसौदा लिखने की कोशिश करती है। मगर कागज पर एक शब्द नहीं उतरता। लगता है ‘लिखूंगी तो अपनी व्यथा ही उतरेगी। मगर नहीं, अब ये व्यथा केवल मेरी नहीं हर औरत की है। हर उस औरत की, जिसके साथ कभी भी, कहीं भी जबरदस्ती हो सकती है। कोई औरत यह दावा नहीं कर सकती कि उसके साथ कभी ऐसा नहीं हो सकता। मैं हर औरत के लिए लड़ूंगी...नहीं नहीं हर औरत को साथ लेकर लड़ूंगी।’ 
    सोचते हुए कंचन के मन का झंझावत थमा।
    उसने लिखा- ‘‘यह अपील हर नागरिक के लिए है। महिलाओं के साथ दुष्कर्म सम्बंधी कानूनों में सुधार के लिए हम एक जनआंदोलन की आवष्यक्ता महसूस करते हैं ताकि सबको न्याय मिल सके। इन संशोधनों में पीडि़त स्त्री के पूर्व चरित्र पर ध्यान न देना, उसका बयान उसके घर पर रेकार्ड करने की सुविधा, बलात्कार के मामलों में आरोपी को मामले की सुनवाई पूरी होने तक जमानत न मिलना, बलात्कार की परिभाषा का दायरा व्यापक करन, समानांतर जांच एजेन्सी को मान्यता देना, मामले की प्रतिदिन सुनवाई होना......मुख्य है। कानून को ताकतवर बनाने में जनमत की सशक्त भूमिका है अतः सभी के सहयोग की जरूरत है।’’
    मणि ने इसमें जोड़ा ‘‘इसे केवल स्त्री की समस्या न मानें। स्त्री पारिवारिक ढांचे की धुरी है। उसकी समस्या से पूरा परिवार और समाज प्रभावित होता है। अतः पुरुषों से भी सहयोग का आह्वान है। कोमल और नन्हीं बूंदें जब संगठित होती हैं तो चट्टानों को भी काट देती हैं। हम सब एकजुट होकर समाज को सुंदर बनाएं।’’
    यह मसौदा उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजा।
    रात को कंचन ने सपने में देखा कि ढेर सारे हाथों ने कांटेदार झाडि़यों का जंगल साफ कर दिया, वहां गुलमोहर के ढेरों पौधे उग आए। वे झूम-झूमकर गीत गाते हुए तेजी से पेड़ बन रहे हैं।
    और ऐसा ही हुआ भी, जब अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग, नई दिल्ली के हस्ताक्षर से यह आह्वान सारे देश के समाचार पत्रों में, हर प्रांतीय भाषा में छपा, टेलीविजन के हर चेनल पर श्रीमती चटर्जी के आह्वान की रेकार्डेड सी.डी. हर लोकप्रिय कार्यक्रम के ब्रेक में दिखाई गई। इसके अलावा लगभग सभी कम्पनियों के मोबाइल पर श्रीमती चटर्जी की ओर से एस.एम.एस. भेजे गए। सारे बुध्दिजीवियों, समाजसेवी संगठनों को अलग से पत्र भी भेजे गए।
    कंचन और मणि के सुझाव पर चुनावी प्रचार अभियान की तर्ज पर यह अभियान चलाया गया। छोटी सी चिंगारी ज्वाला बनकर पूरे देश में धधक गई।
    और निश्चत दिन, निश्चित समय पर पूरे देश में, हर नगर, हर गांव, हर कस्बे में निश्चित जगह पर लोग इकट्ठे हुए। इसमें कंचन भी थी और मणि भी था। राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश में ऐसा विशाल जनमत पहली बार ही सक्रिय हुआ था, खासकर उस समस्या के लिए जिसे केवल स्त्रियों की माना जाता था। इस आंदोलन की सर्वाधिक सफलता थी-इसमें पुरुषों की भागीदारी, यह एक विशिष्ट घटना थी।
    इस आंदोलन से पूरा देश हिल गया, राजधानी थरथराने लगी। जनमत की ताकत का प्रमाण तब मिला, जब बलात्कार कानून में संशोधन के उद्देश्य से तीन दिन के भीतर एक समिति गठित की गई।
    और ठीक एक महीने बाद ही...पीडि़त स्त्री के पूर्व चरित्र पर ध्यान देने सम्बंधी धारा को हटा दिया गया। बाकी संशोधनों पर भी विचार जारी था। यह खबर पाते ही जनमत ने दांतों तले उंगली दबा ली। इतनी ताकत है उसमें और वही अनभिज्ञ था अपनी ताकत से। राष्ट्रीय महिला आयोग ने जनमत को उसकी ताकत से परिचित कराया था। इस पूरे परिदृश्य के पीछे थी-खास तौर पर कंचन और उसके साथ मणि।
    उसी रात कंचन ने सपने में देखा? कंटीली झाडि़यों के डरावने जंगल में गुलमोहर का एक पेड़ लगा था, पेड़ से अंगारे गिरने लगे और डरावना जंगल सुलग कर राख हो गया, फिर कंचन और मणि ने गरम राख के बीच एक कंडा दबा दिया, सुलगता रहने के लिए।



गुरुवार, 21 जून 2012

ठीक अभी इसी वक्त - मीनाक्षी स्वामी

                                   
                                       
मैं नहीं जानती कि
अभी इसी वक्त
जबकि मैं बैठी हूं अपनी बालकनी में
ठंडी गुनगुनी सुबह में
गरम-गरम चाय के प्याले के साथ
सामने के खूबसूरत पेड़ों की
फुनगियों को देखते हुए
ठीक अभी इसी वक्त
कहीं क्या हो रहा होगा

शायद कहीं कोई आतंकवादी ए. के. 47
दनदना रहा हो....शायद
पर यह तो जरूर है कि कहीं कोई
फूल खिल रहा होगा जरूर

शायद कोई चिडि़या कैद हो गई हो
बहेलिये के जाल में....शायद
पर यह तो जरूर हे कि
ठीक अभी इसी वक्त किसी परिन्दे ने पहली बार
आसमान में ऊंची उड़ान जरूर भरी होगी

षायद कोई मुर्गी या बकरा
चीत्कार कर रहा होगा
हलाली के पहले....शायद
पर यह तो जरूर है कि
कोई मुर्गी अंडा से रही होगी जरूर
और कोई चूज़ा अंडे से बाहर आया होगा
ठीक अभी इसी वक्त

ठीक अभी इसी वक्त
चूडि़यां खनकी होंगीं
और सुलगा होगा चूल्हा
गरम-गरम रोटियों की सौंधी-सौंधी खुश्बू
ठीक अभी इसी वक्त मैंनें सूंघी है हवा में

शायद कहीं कोई साजिश कर रहा हो
किसी के खिलाफ
शायद समूची दुनिया के भी खिलाफ
ठीक अभी इसी वक्त...शायद
पर यह तो जरूर है
मंदिर में घंटियां बज रही होंगीं
ठीक अभी इसी वक्त
डनकी अनुगूंज
मेरे कानों से टकराई है

मैं नहीं जानती कि
अभी इसी वक्त
जबकि मैं बैठी हूं अपनी बालकनी में
ठंडी गनुगुनी सुबह में
गरम-गरम चाय के प्याले के साथ
सामने के खूबसूरत पेड़ों की
फुनगियों को देखते हुए
ठीक अभी इसी वक्त
कहीं क्या हो रहा होगा

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जाते हुए वर्ष की पदचाप--- मीनाक्षी स्वामी

आज सोच रही हूं कि जाते हुए साल में क्या हुआ तो एक किताब का लोकार्पण...

कुछ कहानियां प्रकाशित, अप्रकाशित...। खास एक उपन्यास...एक ब्लाग...ग्यारह पोस्ट...कई टिप्पणियां...एक फेसबुक...कुछ मित्र....।  बीते साल की शुरुआत महेश्वर से फिर जयपुर, वाराणसी, ग्वालियर, उज्जैन, भोपाल, बेतूल छोटी छोटी यात्राएं...और कुछ रिजर्वेशन केंसल । उपन्यास "भूभल" पाठक मंच में।कुछ अनुवाद आए अंग्रेजी, मराठी और तमिल में...। 
 


कुछ कार्यक्रमों में शिरकत। 
 कुछ कार्यशालाएं...।
बहुत सारे अधूरे काम और ख्वाहिशें....शायद इस नए साल में पूरे हों।
और हां दो पुरस्कार उपन्यास "भूभल" पर एक वाराणसी से कादम्बरी पुरस्कार...

 और दूसरे की जाते जाते साल ने दी सूचना 



 उपन्यास "भूभल" पर ही
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार...।

और एक कहानी गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय हरिद्वार  में एम. ए. के पाठ्यक्रम में...।
अच्छा ही रहा...।

देखते हैं आने वाले साल में क्या होता है.....?

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

सम्मान समारोह ---मीनाक्षी स्वामी

                 अखिल भारतीय विद्वत् परिषद, वाराणसी द्वारा वाराणसी में पिछले दिनों भव्य आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि थे पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री श्री आरिफ मोहम्मद खान। अति विशिष्ट अतिथि संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप,  संस्कृत अकादमी गुजरात के निदेशक श्री जयप्रकाश नारायण द्विवेदी, महर्षि पणिनी संस्क्रत विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, वेंकटेश वेद विश्वविद्यलय के कुलपति श्री सुदर्शन शर्मा।
                आरम्भ में अतिथियों ने दीप प्रज्जवन कर आयोजन का शुभारंभ किया।
                श्री आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि हमारी पहचान भारतीयता है। इसे कायम कर लें तो हम दुनिया में सबसे ताकतवर हो जाएंगें। संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप ने कहा कि आज विद्या का अवमूल्यन हो गया है, संस्क्रत की पुनर्स्थापना से यह उन्नत होगा।



                इस आयोजन में मेरे उपन्यास ‘भूभल’ को कादम्बरी पुरस्कार से पुरस्क्रत किया गया। पुरस्कार स्वरूप पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री श्री आरिफ मोहम्मद खान, संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप, संस्कृत अकादमी गुजरात के निदेशक श्री जयप्रकाश द्विवेदी व संस्था के अध्यक्ष श्री जयशंकर त्रिपाठी द्वारा ग्यारह हजार रुपये, वाग्देवी प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र, शाल, श्रीफल प्रदान किए गए।
                इस अवसर पर डा. कामेश्वर उपाध्याय की पुस्तक "हिंदू जीवन पद्धति" का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम का संचालन किया डा. कामेश्वर उपाध्याय ने।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

"भूभल"---मीनाक्षी स्वामी

"भूभल" उपन्यास से कथा अंश ----मीनाक्षी स्वामी


मित्रों, आप सभी को यह जानकर खुशी होगी कि मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ने इस उपन्यास को पाठक मंच के लिये चुना तो जून जुलाई में प्रदेश भर में चर्चा, प्रशंसा हुई।

वाराणसी में अखिल भारतीय विद्वत् परिषद ने इसे पुरस्कार के लिये चुना है। नवम्बर में आयोजन है।


सर्दियों के छोटे-छोटे दिन।
शाम साढ़े पांच-छह बजे तक तो अंधेरा घिर जाता। ठंड के मारे लोग घरों में दुबक जाते। सड़कें भी सुनसान। बच्चे स्कूल से आकर कुछ खाते-पीते, तरोताजा होते कि घना अंधेरा घिर जाता। खेलना तो हो ही नहीं पाता।
वह महीने का आखिरी दिन था। हमेशा की तरह स्कूल आधे दिन ही लगा। बच्चे जल्दी घर आ गए थे। बहुत दिनों बाद शाम को खेलने का कार्यक्रम बना। तय हुआ कि काका के पास जाएंगें। फिर वहीं खेल कूद कर वापस आ जाएंगें। सरला, राज, इंदु, कंचन और दिनेश सब चल दिए, काका की नर्सरी की तरफ।
‘‘अच्छा हुआ आ गए, आज मेथी के परांठे खिलाउंगा।’’ काका ने स्नेह से भिगो दिया।
‘‘मेथी के परांठे के साथ टमाटर की सब्जी......।’’ सरला चिहुंकी
‘‘हां काका, पर अभी तो हम खेलेंगें।’’ राज ने टोका
‘‘ओह ! अभी तो मैं भी तैयारी करूंगा। तुम खेलो तब तक.....।’’
काका नर्सरी के पीछे की तरफ मेथी, टमाटर तोड़ने चले गए। बच्चे छुपा छाई खेलने लगे। पहली बार सरला पर दाम आया। नर्सरी काफी बड़े मैदान में फैली थी। बच्चे दूर-दूर जाकर छुप गए। उन्हें ढूंढने में सरला को देर लगी। अगली बार राज पर दाम आया। जब उसने ढूंढा तो सब तो मिल गए पर सरला नहीं मिली।
‘‘जाने कहां दूर जाकर छुपी है...सरला....।’’
‘‘सरला.......’’ राज ने आगे बढ़ते हुए आवाज दी।
दूसरे बच्चों ने भी आवाज दी।
‘‘हमेशा ऐसे ही करती है......सरला...सरला....।’’ आवाज देते हुए बच्चे नर्सरी में घूम कर, पेड़ों, झाडि़यों के पीछे सरला को ढूंढने लगे।
‘‘खेल खतम हो गया है सरला...निकल आओ।’’ कंचन ने हथेलियों का भोंपू सा बनाकर आवाज दी। मगर कोई जवाब नहीं आया। दूर एक जगह झाडि़यां हिलती सी दिखी तो बच्चे उसी दिशा में दौड़े मगर वहां कोई नहीं था। चारों हैरान - परेशान ढूंढ रहे थे। देर होने से घर वालों की डांट का डर भी सता रहा था। अंधेरा तेजी से फैल रहा था।
‘‘कहां गई होगी सरला......काका के पास चलें कभी उनके पास हो तो !’’ कंचन बोली
‘‘हां-हां काका के पास चलते हैं, वहीं होगी वो...।’’ इंदु ने कहा।
‘‘नहीं होगी तो भी काका हमारे साथ ढूंढेंगें।’’ राज ज्यादा चिंतित था।
तभी सरला के चीखने की आवाज सुनाई दी। आवाज नर्सरी के पीछे की तरफ से आ रही थी। बच्चे आवाज की दिशा में दौड़े।
‘‘कौन है...?’’ फिर काका की कड़क आवाज आई।
तभी मोटर साईकिल स्टार्ट करने की आवाज आई जो कुछ पलों में ही बंद हो गई।
फिर काका की आवाज आई - ‘‘अरे बाबा रे...मार डाला रे...नहीं छोड़ूंगा...तुम्हें नहीं छोड़ूंगा...।’’
काका के कराहने की आवाज के साथ मोटर साईकिल स्टार्ट होकर घीरे-घीरे उसकी आवाज दूर जाती सुनी बच्चों ने। वे आवाज की दिशा की तरफ दौड़ पड़े थे। नर्सरी के पीछे बांउड्री के कांटेदार तारों के पास काका जमीन पर पड़े कराह रहे थे। उनके माथे से खून निकल रहा था। बच्चे घबरा गए...।
‘‘काका...काका...ओ काका....।’’
‘‘वो...वो...वो...स...र...ला...।’’ काका ने सड़क के दूसरी ओर हाथ उठाकर किसी तरह कहा और बेहोश हो गए । बच्चों ने उस ओर देखा, कांटेदार तारों के उस पार सड़क पर सरला......।
कंचन और इंदु दौड़कर सरला की तरफ गए....। वह पीठ के बल पड़ी थी । उसके सिर के पिछले भाग की तरफ ढेर सारा खून बहकर जमीन पर फैला हुआ था... । उसका स्कर्ट एक तरफ पड़ा था।
काका और सरला का यह हाल देखकर बच्चों की तो घिग्घी बंध गई। काटो तो खून नहीं। एक शब्द भी नहीं बोल पा रहा था कोई। कंचन ने जैसे-तैसे स्कर्ट उठाकर उसके शरीर को ढका। यह जगह बिल्कुल सुनसान थी। यहां दिन में भी कोई नहीं आता था। एक ओर किसी फेक्ट्री की ऊंची दीवार, दूसरी ओर काका की नर्सरी के बड़े-बड़े पेड़। यहां वैसे भी अंधेरा जल्दी महसूस होने लगता था। और अब तो अंधेरा पूरी तरह उतर ही चुका था। बच्चे बुरी तरह घबरा रहे थे। इंदु तो डर के मारे रोने लगी। राज कांप रहा था। कंचन और दिनेश का तो दिमाग जैसे सुन्न ही हो गया था ।
तभी किसी वाहन की लाइट पड़ी। देखा तो दूर से एक रिक्षा आ रहा था, पास आकर रूका। ‘‘अरे...किरण....राज....तुम...!’’
संयोग कि देवयोग, ये तो गोपाल था ।
‘‘गोपाल भैया.....।’’ किसी तरह कंचन ने कहा और उस ओर इशारा किया।
गोपाल, कंचन के बाबूजी के दफ्तर में चपरासी था। छुट्टी के बाद आटो रिक्षा चलाता था। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई सारा माजरा समझ गया। झटपट नर्सरी गया। वहां से एक फोन उसने पुलिस को किया, दूसरा कंचन के घर। बच्चों को उसने भीतर काका के घर में बिठाया, खुद काका और सरला के पास खड़ा हो गया। पुलिस के पहले पहुंचे कंचन के बाबूजी। उनके साथ थे इंदु और सरला के पापा। सब ऐसे गंभीर थे कि बच्चों की तो कुछ देखने पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। डरे हुए तो पहले से ही थे।
कंचन के बाबूजी सब बच्चों को घर छोड़ने आए। वे रास्ते भर चुप थे। बच्चों को छोड़कर उल्टे पैरों लौट गए। अम्मा तो रास्ता ही देख रही थी। जैसे ही बच्चे आए, उन्हें दरवाजा बंद करने का कहकर सरला के घर चली गई।
‘‘कंचन क्या हो गया सरला को....काका को किसने मारा......?’’ राज ने पूछा
‘‘पता नहीं...कोई कुछ बोलता नहीं...।’’ वह भी कुछ समझ नहीं पा रही थी।
‘‘हमें कोई कुछ बताता क्यों नहीं ?’’ राज चुप नहीं हो रहा था जबकि कंचन का मन बात करने नहीं था।
‘‘मुझे क्या पता ! तू सरला के घर जा...वहां अम्मा हैं....पूछ ले उनसे...।’’ कंचन ने चिढ़कर कहा।
और राज सचमुच ही उठकर चलने को हुआ।
‘‘ठहर मैं भी आती हूं।’’ कंचन भी उठी। बाहर से कुंडी लगाकर दोनों सरला के घर की तरफ चले। उनके घर का दरवाजा उढ़का हुआ था। राज ने धक्का दिया तो खुल गया। भीतर सरला की मम्मी फूट-फूटकर रो रही थी। अम्मा और इंदु की मम्मी उन्हें समझाकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी।
राज और कंचन भीतर चले गए -‘‘अम्मा.....।’’
‘‘चलो बेटा....।’’ कहते हुए अम्मा उठ खड़ी हुई और अपने साथ दोनों को बाहर ले आई।
‘‘घर जाओ बेटा...।’’ बाहर आकर उन्होंने समझाया।
‘‘अम्मा, सरला को क्या हुआ...? काका को क्या हुआ ?’’ राज ने पूछा।
‘‘कुछ नहीं बेटा। बाबूजी और सब लोग अस्पताल गए हैं ना उनके पास !’’ अम्मा ने फिर समझाया।
‘‘लेकिन...अम्मा...वो...वो...वो...वो...’’ राज अटकने लगा तो कंचन ने बात पूरी की - ‘‘अम्मा...क्या हुआ.....? सच बताओ ना !’’
‘‘बेटा, कुछ बदमाशों ने उन्हें मारा है। अब तुम घर जाओ।’’ अम्मा उन्हें लगभग घसीटती हुई घर ले आई और भीतर करके दरवाजे की कुंडी बाहर से चढ़ाकर उल्टे पैरों सरला के यहां लौट गई।
‘‘किसने मारा होगा सरला और काका को...! कौन बदमाश थे वो...।’’ कंचन ने राज से बात करके अपने मन की व्यथा को कम करना चाहा।
‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत डर लग रहा है।’’ राज की घबराहट अभी भी कम नहीं हुई थी।
इसी तरह के अनसुलझे सवाल दोनों आपस में तब तक करते रहे जब तक नींद ने उन्हें अपने आगोश में नहीं ले लिया। बाबूजी-अम्मा कब आए ? देर रात तक क्या होता रहा ? मासूम बच्चों को कुछ नहीं पता।
अगले दिन सुबह उठे तो फिर अम्मा से पूछने लगे। अम्मा ने केवल इतना कहा- ‘‘काका और सरला को अस्पताल ले गए हैं...और तुम दोनों तैयार होकर स्कूल जाओ।’’
‘‘और हां...स्कूल में किसी से भी इस बारे में कोई बात मत करना....और आपस में भी नहीं, समझे...।’’ बाबूजी ने बहुत जोर देकर कहा।
राज और किरण उतना भर ही समझे जितना बाबूजी ने कहा था। मगर वे तो वह सब कुछ जानना समझना चाहते थे जो उन्हें नहीं बताया जा रहा था या उनसे छुपाया जा रहा था। कंचन ने गौर किया कि बाबूजी गहरे सोच में डूबे हैं। तभी उन्होंने अम्मा के पास जाकर धीरे से कुछ कहा। अम्मा ने सहमति में गरदन हिलाई। फिर वे राज और कंचन की तरफ रूख करके बोली - ‘‘ऐसा करो, आज तुम दोनों स्कूल मत जाओ...घर पर ही पढ़ाई करो।’’
‘‘और हां...अम्मा को परेशान मत करना। मैं जरा अस्पताल तक होकर आता हूं।’’ इतना कहकर बाबूजी निकल गए ।
‘‘अम्मा, मैं इंदु के यहां से आती हूं।’’ कहकर अम्मा का जवाब सुने बिना कंचन तीर सी निकली और जा पहुंची इंदु के घर। पीछे-पीछे राज भी आया।
‘‘ओह बाबूजी ! आप यहां बैठे हैं ? आप तो अस्पताल जा रहे थे ना !’’ बाबूजी को देख कंचन के मुंह से निकला।
‘‘हां बेटा, मैं और गणेश भाई साथ ही जाएंगें...अभी निकल ही रहे हैं।’’
कंचन भीतर पहुंची । इंदु और दिनेश को उसकी मम्मी यही हिदायत दे रही थी ‘‘देखो, इस बारे में किसी से कोई बात मत करना।’’ उन दोनों को भी आज स्कूल नहीं भेजा गया था। चारों हैरान थे और परेशान भी।
‘‘मम्मा, हम सरला और काका को देखने अस्पताल जा सकते हैं ?’’ इंदु ने अपनी मम्मी से कहा तो बाकी तीनों भी उससे सहमति का स्वर मिलाने लगे।
‘‘तुम चारों पढ़ाई करो...और हां कंचन...राज...तुम भी अपने घर जाओ और पढ़ो ।’’ इंदु की मम्मी ने कहा
कंचन और राज घर लौट आए । अम्मा नाराज हो रही थी ‘‘तुम अब कहीं नहीं जाओगे और किसी से कोई बात नहीं करोगे, चुपचाप पढ़ने बैठ जाओ।’’ अम्मा ने गुस्से से कहा तो दोनों किताब खोलकर पढ़ने बैठ गए । मगर मन कल की घटना और बड़ों के अजीब व्यवहार पर दौड़ता रहा ।
दोनों बुरी तरह चकरा गए जब अम्मा ने कहा ‘‘देखो कभी पुलिस आए और कुछ पूछे तो बताना मत कि कल तुम सरला के साथ खेल रहे थे या काका की नर्सरी पर गए थे...समझे !’’
‘‘पर हम तो गए थे...।’’ कंचन ने कहा तो अम्मा ने उसे बुरी तरह डांट दिया ‘‘जैसा कहा है वैसा करो। ज्यादा दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं है...।’’ फिर वे बड़बड़ाने लगी ‘‘हरिश्चंद का सत तो इन्हें ही चढ़ा है।’’
कंचन और राज हैरान थे। वे पूछना चाहते थे, पुलिस क्यों आएगी ? और क्या पूछने वाली थी और उसे सच क्यों नहीं बताना है ? मगर अम्मा की डांट से सहमे हुए दोनों फिर किताब खोलकर बैठ गए।
‘‘खाना खा लेना। मैं सरला के यहां जा रही हूं।’’ जल्दी-जल्दी काम निपटा कर अम्मा सरला के यहां चली गई।
राज और कंचन ने किताब एक तरफ रख दी। भूख तो थी नहीं। अपनी सोच से उपजे उन प्रश्नों को, जिनके जवाब दोनों के पास नहीं थे, एक दूसरे से पूछ-पूछकर अपने मन के भारीपन को हल्का करने की कोशिश करने लगे । बात जो भी है, बहुत गंभीर है, यह तो वे समझ रहे थे । मगर क्या है, यह नहीं जान पा रहे थे । काका और सरला की शारीरिक अवस्था तो उन्होंने अपनी आंखों से देखी थी । मगर पुलिस की बात....? सबसे छुपाने की बात...? उनकी समझ के बाहर थी । जब प्रश्नों का सिलसिला खतम हो गया तो दोनों गहरे सोच में डूबकर, कुछ बाहर लाने की नाकाम कोशिश करने लगे ।
आज का अखबार टेबल पर ही पड़ा था। कंचन ने यूं ही उठा लिया और अनमने मन से देखने लगी। अंदर के पेज पर एक हेडलाइन पर नजर पड़ते ही वह चौंक गई-
‘नर्सरी के पास बालिका से बलात्कार के बाद हत्या, वृद्ध घायल’
जल्दी से पूरी खबर पढ़ी और पढ़कर हतप्रभ रह गई । लिखा था - ‘‘कल शाम कालका माता मंदिर के पास स्थित काका की नर्सरी के पास अकेली जा रही ग्यारह वर्षीय बालिका की अज्ञात बदमाशों ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी । घटना को देखकर शोर मचाने वाले वृद्ध नारायणप्रसाद मिश्रा ‘काका’ को बदमाशों ने सिर पर भारी पत्थर मार कर घायल कर दिया। ‘काका’ की हालत गंभीर है। पुलिस के अनुसार बालिका के साथ बलात्कार किया गया था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने पर मामले का खुलासा होगा।’’
खबर के साथ काका की हालत की तस्वीर भी थी ।
‘‘रा...ज...ये...दे....ख..प...ढ़......।’’ कंचन चीखी
राज ने पढ़ा और जड़ हो गया। ग्यारह वर्षीय बालिका सरला ही तो है। तो सरला की हत्या हो गई ! मगर सरला का नाम अखबार में क्यो नहीं है ? काका का तो है। और सरला तो हमारे साथ खेल रही थी। ऐसा क्यों नहीं आया अखबार में...?
कंचन की आंखों के आगे कल रात की घटना घूमने लगी। काका की हालत भी गंभीर है। वह सिर पकड़कर बैठ गई।
जरा देर बाद उसने राज से पूछा-‘‘और ये बलात्कार क्या होता है...?’’
कंचन नहीं जानती, राज भी नहीं जानता। वह चुप है।
कंचन ने राज को झिंझोड़ा...‘‘राज बता ना ! बलात्कार क्या होता है...?’’
‘‘मु...झे...मुझे नहीं....पता...।’’ किसी तरह राज के मुंह से निकला।
‘‘चल इंदु के पास चलते हैं ।’’
‘‘और उसकी मम्मी ने वापस जाने को कहा तो...?’’ राज ने शंका जताई
‘‘अरे उसकी मम्मी भी तो सरला के यहां होंगीं।’’ कंचन ने समझाया।
दोनों निकले। कंचन ने अखबार रख लिया। जाकर इंदु और दिनेश को दिखाया तो वे भी दहल गए। इंदु ने कंचन से बलात्कार का मतलब पूछा । मगर कंचन भी कहां जानती थी।
जानती तो सरला भी नहीं थी......।
मगर जो भी हुआ बुरा था...बहुत बुरा। यह तो वे चारों समझ रहे थे। चारों बहुत दुखी थे। सरला उनकी गहरी मित्र थी। बचपन से अभी तक वे सब साथ खेलत-पढ़ते रहे थे। उन्हें काका की भी चिन्ता थी। मगर उन्हें कोई कुछ बता ही नहीं रहा था। इसका अलग दुख था उन्हें। धीरे-धीरे चारों के सवाल, दुख सब मिलकर आंसुओं के रूप में बाहर आने लगे। काफी देर तक रोकर मन हलका हुआ तो पता चला सरला को एम्बुलेंस में लाए हैं। वे सरला से अंतिम विदा लेना चाहते थे मगर बड़ों ने इसकी जरूरत ही नहीं समझी। हां, इंदु के घर की खिड़की से छुपकर जितना देख सकते थे, देखते रहे, रोते रहे।
लंबे समय तक वे इस शोक में डूबे रहे। उनका मन कहीं नहीं लगता था। यह घटना रात दिन उनकी आंखों में बसी रहती थी। स्कूल भी जाते तो क्लास में उनका ध्यान नहीं होता। किताब खोलते तो अखबार की वही मनहूस खबर वाले अक्षर आंखों के आगे आ जाते।
काका को देखने घर के बड़े लोग जाते रहते। महीना भर बीत गया था पर काका कोमा से बाहर नहीं आए। ऐसा बड़ों की बातों से, उन सबकी समझ में आया। ‘कोमा’ का मतलब वे नहीं जानते थे। कंचन ने साहस करके अम्मा से पूछा तो उन्होंने बताया-‘‘काका को चोट लगने के बाद से होश नहीं आया है।’’
कंचन का मन हुआ कि अम्मा से बलात्कार के बारे में भी पूछे। मगर उनका कठोर चेहरा देखकर हिम्मत ही नहीं हुई। बड़ों की बातों से यह भी पता चला कि पुलिस को बदमाशों के बारे में कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है। काका के होश में आने पर ही कुछ पता चल पाता पर उन्हें भी तो होश नहीं आया था। पुलिस को भी उनके होश में आने का इंतजार था।
घर का माहौल भी इतने दिनों से ठीक नहीं था। अम्मा बात-बात पर डांटती टोकती रहती। इंदु के घर में भी यही स्थिति थी। पूरी गली के घरों में लड़कियों के बाहर खेलने-घूमने पर रोक लग गई। बस, घर से स्कूल और स्कूल से घर। जरा भी देर हो जाए तो घर वाले ढूंढने लग जाते। बच्चे काका से मिलना चाहते थे मगर संभव नहीं दिखता था । एक दिन चारों ने योजना बनाई और स्कूल से लौटते हुए काका को देखने अस्पताल पहुंचे। मगर अस्पताल के कम्पाउंड के भीतर घुसे ही थे कि गणेश चाचा याने इंदु के पापा मिल गए। वे चारों को भीतर ले गए। एक कमरे में पारदर्शी कांच की दीवारें थी, वहीं से बच्चों ने काका को देखा। वे बेहोश थे और नाक में नलियां लगी थी। भारी मन से चारों बाहर निकले। गणेश चाचा ने चारों को घर छोड़ा। मगर घर लौटकर, बिना बताए अस्पताल जाने के लिए चारों की जमकर पिटाई हुई।
दिन बीत रहे थे। मगर काका की तबियत में कोई सुधार नहीं था। सरला के हादसे के सदमे से बच्चे अभी उबर भी नहीं पाए थे कि होली के ठीक दो दिन पहले काका के न रहने की बुरी खबर मिली।
सारे बच्चे रो रोकर बेहाल थे। शाम को देर तक बच्चे कंचन के आंगन में काका के लगाए गुलमोहर के पेड़ से लिपटकर रोते रहे और काका के होने के एहसास से मन को भरमाते रहे। इस साल गली के किसी भी बच्चे का रिजल्ट ठीक नहीं आया। इसके बाद के साल दुर्घटना की स्मृति को धीरे-धीरे घुंघला करते रहे। बावजूद इसके, सरला के घर के आगे से निकलते हुए उनकी निगाह उस ओर उठती और वहां स्थायी रूप से लटका ताला देखकर उनका मन उदास हो जाता। इसके अलावा भी कभी भी, किसी के भी मन पर उस दिन का वह मनहूस दृश्य ज्यों का त्यों उभर आता ।
कच्चे मन पर पक्के निशान अंकित हो गए थे।

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